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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 368 में से

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पृष्ठ 122

परिवेषक्रियाधिकरण ] [ ६६
घनगर्भमणे प्रान्तरेखायामपि पूर्ववत् ।
स्थापयेत् पवनास्याख्यदर्पण सुदृढ यथा ॥ १४६ ॥
धूमास्यदर्पण शल्याकरेखाया तथैव हि ।
वारुणास्यदर्पण तु रेखाया शारिकामणे ॥ १४७ ॥
तथा सोमरेखाया जलगर्भाख्यदर्पणम् ।
तुषाम्यमणिरेखायामग्निमित्राख्यदर्पणम् ॥ १४८ ॥
तारास्य, पवनास्य,धूमास्य, वारुणास्य, जलगर्भ, अग्निमित्र, छायास्य ये आठ प्रकार के दर्पण
नाम कहे हैं । इस प्रकार दर्पणों के यथाक्रम नाम कह कर उनका यथाशास्त्र विनियोग क्रम कहा जाता
है । धूमास्य मणि की रेखा में छ अ गुल छोड़ कर तारास्य दर्पण को मणि के सम्मुख ऊपर प्रदेश में
कील से युक्त शलाका से रखे, घनगर्भ मणि की प्रान्त रेखा में पवनास्य दर्पण को स्थापित करे, धूमास्य
दर्पण को शल्याक मणि की रेखा में तथा वारुणास्य दर्पण को शारिकमणि की रेखा में तथा जलगर्भ
नामक दर्पण को सोमक मणि की रेखा में अग्निमित्र नामक दर्पण को तुषास्य मणि की रेखा में सीध
में रखे ॥ १४२-१४८ ॥
छायास्यदर्पण शङ्खमणिरेखान्तरे तथा ।
अ शुपमणिरेखाया भानुकण्ठदर्पणम् ॥ १४६ ॥
एव क्रमेण विधिवत् पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ।
स्थापयेच्छक्त्याकर्षणदर्पणान् सुदृढान् क्रमात् ॥ १५० ॥
अथ तत्पश्चिमे केन्द्रे शक्तितन्त्रे भिवर्णितम् ।
नवम स्थापयेद् विद्युच्छक्तियन्त्र सकीलकम् ॥ १५१ ॥
अथ ताम्रावर्ततन्त्रीन् चर्मपञ्चके वेष्टितान् ।
प्रसारयेच्छक्तियन्त्रात् सर्वत्र विधिवत् समम् ॥ १५२ ॥
त्वक्पञ्चकस्य नामानि सग्रेहेण यथामति ।
क्रियासारोक्तरीत्यात्र कथ्यन्तेन्विष्य च क्रमात् ॥ १५३ ॥
गे (घे ?) ण्डाकूर्मश्वाखुशशनक्राणा च यथाक्रमम् ।
चर्माणि पञ्च प्रोक्तानि मुनिभिशास्त्रवित्तमै ॥ १५४ ॥
छायास्य दर्पण को शङ्ख मणि की सीध में तथा भानुकण्ठ दर्पण को अशुप मणि की रेखा में
रखे । इस प्रकार विधिपूर्वक पूर्वोक्त मार्ग से शक्त्याकर्षण दर्पणों को स्थापित करे । फिर उनके पश्चिम
केन्द्र में शक्तितन्त्र में वर्णित नवम विद्युत्—शक्ति यन्त्र को कीलसहित स्थापित करे, पुन ताम्बे से
घिरे तारों को पाच चर्म में लिपटे हुओं को शक्ति यन्त्र से विधिवत् समानरूप में प्रसारित करे, पांच
चर्मों के नाम संक्षेप से यथामति क्रियासार ग्रन्थ की रीति से यहां खोजकर कहे जाते हैं । गेण्डा, कछवा,
श्वाखु, शश, नाका यथाक्रम पांच चर्म शास्त्रज्ञ मुनियों ने कहे हैं ॥ १४६-१५४ ॥
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