बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिवेषक्रियाधिकरण ] [ ६५
भवेत् तत्सूर्यकिरणैस्सूत्रबद्धोण्डजादिवत् ॥६७॥
विमानाकर्षण सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय । इत्यादि ।
शिरीषशक्ति के दोभाग मेघशक्ति के आठ भाग कहे हैं भू-पृथिवी शक्ति के पांच भाग तारा-
शक्ति के सात आकाशशक्ति के दश भाग हों, यह शास्त्र का निर्णय है, शक्त्याकर्षण यन्त्र से ही भली
प्रकार यथाविधि इन्हें विशेषतः खींच कर निर्वात स्थापित करे। पश्चात् विमान के ऊपर केन्द्र आदर्श
के अन्दर प्रतिबिम्बित सूर्य की प्रकाराकिरणों के साथ पूर्वोक्त पांच शक्तियों को संयुक्त कर दे ऐसा
करने पर आकाश में सम्यक् परिवेष होजावे उस आकाशमणि शक्ति से किरणों का आकर्षण क्रम से
होजाता है, परिवेषमुख से ही यथाविधि युक्त करे तो सूर्य-किरणों से विमानाकर्षण सम्यक् सूत्र से बन्धे
अण्डज—पक्षी की भांति होजावे यह शास्त्र का निर्णय है ॥ ६१-६७॥
परिवेषक्रियायन्त्रमुक्त्वा यथाविधि ॥६८॥
अथ तद्यन्त्ररचनाविधिरत्र निरूप्यते ॥६६॥
परिवेषक्रियायन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर अब उस यन्त्र की रचनाविधि यहां कही
जाती है ॥ ६८-६६ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
अथ यन्त्राङ्गानि ॥ अ० सू० ॥ १
अथ यन्त्र के अङ्ग कहे जाते हैं।
पीठ तत्र त्रयोविंशत्केन्द्राणि च तथैव हि ।
रेखाप्रसारणं तत्तत्केन्द्रस्वरूपानुसारत ॥१००॥
तावदेवावर्तकीलास्तन्त्रीनालास्तथैव हि ।
त्रिचक्रनालस्तम्भश्च द्रावकाष्टकमेव च ॥१०१॥
तथा मण्यष्टक द्रावपात्राष्टकमत परम् ।
शिरीषघनभूम्यादिशक्त्याकर्षणदर्पणा ॥१०२॥
पञ्च विद्युच्छक्तियन्त्रं तु (स्वत् ?) पञ्चकमत परम् ।
औदुम्बरावृत्ततन्त्रीरन्ध्रगर्भा सकीलका ॥१०३॥
आम्रणीकोलकाश्चैव सतन्त्रीकीलकान्विता ।
शक्तिस्थापनापात्राणि तत्सम्मेलनपात्रकम् ॥१०४॥
धूमप्रसारणयन्त्र वातसंयोजक तथा ।
परिवेषक्रियानाल क्षीरचर्मप्रकल्पितम् ॥१०५॥
पीठ, उसमें १३ केन्द्र तथा केन्द्र संख्यानुसार रेखाएं बनाना, उतने ही घूमने वाले पेंच और
तारों के नाल, त्रिचक्रनाल का स्तम्भ, ८ द्रावक, ८ मणियां, ८ द्रावक पात्र, शिरीष मेघ भू आदि
शक्तियों का आकर्षण दर्पण, ५ विद्युत्-शक्ति, ५ यन्त्र, ताम्बे के बने लिपटे तारों और अन्दर छिद्रवाली
कीलें, घुमाने वाले पेंच तारों सहित कीलों से युक्त, शक्तिस्थापन पात्र, उनके मिलाने वाला पात्र, धूम
फैलाने वाला यन्त्र और वातसंयोजक यन्त्र, दूध के चर्म से बना हुआ परिवेषक्रियानाल ॥१००-१०५॥