बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्त्यधिकरणं ] [ ६१
संयोजयेत् कान्तपाराभ्रजकंचुकद्रावके ।
तस्य पाराभ्रशक्तिभ्या मिलित्वा सातिवेगत ॥ ५७ ॥
उड्डीयोड्डीय वेगेन गगनाभिमुखी भवेत् ।
विधिवत् ता समाहृत्य नालतन्त्रीमुखात् पुनः ॥ ५८ ॥
शङ्कुमूलस्थच (छ ?) षकमूलकेन्द्रे नियोजयेत् ।
तथा विमानसञ्चाररेखामार्गाद् यथाविधि ॥ ५९ ॥
तत्रत्यवातावृत्तस्थशक्तिगर्भान् सुसूक्ष्मकान् ।
आदित्यकिरणान् पश्चाद् यथाशास्त्र मरुन्मुखात् ॥६०॥
समाहृत्य प्रमाणेन च(छ ?)षकास्ये नियोजयेत् ।
उस रोहिणी शक्ति को लेकर कान्त पारा अभ्र से पूर्ण कञ्चुकद्राव में पूर्व की भांति युक्त करे
उसकी पारा अभ्र शक्तियों से वेग से मिल कर वेग से उड उड कर आकाश के अभिमुख हो जावे उसे
विधिवत् नालतार के मुख से लेकर शङ्कुमूलस्थित पात्रमूल केन्द्र मे युक्त करे तथा विमान के सञ्चार
रेखा मार्ग से यथाविधि वहा के वायुचक्र—वायुमण्डल में स्थित शक्तिगर्भ से सूक्ष्म सूर्यकिरणों की
वायुमुख से यथाशास्त्र प्रमाण से लेकर पात्र के मुख में नियुक्त कर दे ॥ ५६-६० ॥
ततस्समग्र तच्छक्तिर्व्याप्य त स्वेन तेजसा ॥ ६१ ॥
तत्रत्यरोहिणीशक्त्या मिलित्वा वेगतस्स्वयम् ।
गगनाभिमुखी भूत्वा वेगात् सम्भ्राम्यति स्वयम् ॥६२॥
तत्रैव स्थाप्य तच्छक्ति तन्त्रिभ्या सप्रमाणतः ।
उदीचीपार्श्वकीलस्थमूलकेन्द्रान्तरात् पुनः ॥ ६३ ॥
शङ्कुमूलस्थच (छ ?) षकमध्यकेन्द्रे नियोजयेत् ।
तद्गर्भस्थितरोहिण्या मिलित्वा वेगतस्स्वयम् ॥ ६४ ॥
आकाशाभिमुखी भूत्वा परिभ्राम्यति तेजसा ।
विधिवत् ता समाहृत्य विमानपथि क्रमात् ॥ ६५ ॥
वातावर्तमुले पश्चाद् योजयेन्नालमार्गतः ।
फिर उस समग्र पात्र को वह शक्ति अपने तेज से व्याप्त कर वहां की रोहिणी शक्ति से स्वयं
वेग से मिल कर आकाश के अभिमुख होकर वेग से घूमती है वहां की उस शक्ति को दोनों तारों से
सप्रमाण स्थापित करके उत्तर दिशा के पार्श्वकीलस्थ मूलकेन्द्र से फिर शंकुमूलस्थ पात्र के मध्य केन्द्र में
नियुक्त करे । उसके गर्भ में स्थित रोहिणी से वेग से स्वयं मिल कर आकाश के अभिमुख होकर तेज
से घूमती है उसे विमान के आकाशमार्ग में लेकर पश्चात वायु के घूममुख में नालमार्ग से युक्त
कर दे ॥ ६१-६५ ॥
तच्छक्तिर्वातसम्बन्धविषशक्ति समूलतः ॥ ६६ ॥
नाशयित्वा खेटयानं स्वभाद् रक्षति स्वयम् ।
तथैव भद्रामाकृष्य सुरघानालतः क्रमात् ॥ ६७ ॥