त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
14 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-गुण्य को (गुणक के) नीचे रखकर विलोम गति से या
अनुलोम मार्ग से कपाट सन्धि क्रम से एक-एक करके क्रमशः गुणा करें। इस क्रम
में प्रत्येक बार गुणक को खिसकाते हुए जिस जिससे गुणा किया गया है, उसमें
गुणन ठहरता है। इस प्रकार इसके कपाटसन्धि तथा तत्स्थ ये दो भेद होते हैं।
अनुशीलन-यहाँ 'प्रत्युत्पन्न' शब्द से गुणन की विधि बताई गई है। पाटी में
गुणक को बार-२ खिसका कर गुणक के इकाई अंक के ठीक नीचे रखने की
क्रिया के कारण इसका कपाट सन्धि नाम दिया गया है।
रूपस्थानविभागाद् द्विधा भवेत् खण्डसंज्ञकं करणम्।
प्रत्युत्पन्नविधाने करणान्येतानि चत्वारि¹।। ७।।
क्षेपसमं खं योगे राशिरविकृतः खयोजनापगमे
खस्य गुणनादिके खं, संगुणने खेन च खमेव²।। ८।।
सुक्षेमा अनुवाद-गुणन की 'खण्ड' संज्ञक विधि 'रूप विभाग' तथा
'स्थान विभाग' के भेद से दो प्रकार की होती है। प्रत्युत्पन्न या गुणन के विधान
में ये 4 प्रकार के करण या भेद होते हैं। (I) शून्य के साथ किसी राशि को जोड़ने
पर योगफल उस क्षेप राशि के बराबर होता है। (II) किसी राशि के साथ शून्य
को जोड़ने या उसमें से शून्य को निकालने पर वह राशि अविकृत या जैसी तैसी
बनी रहती है। (III) शून्य को किसी राशि से गुणित करने पर या 'आदि' पद के
अनुसार भाग, वर्ग, घन करने पर उनका फल 'ख' अर्थात् शून्य हो जाता है। (IV)
शून्य से किसी राशि को गुणित करने पर गुणनफल शून्य ही होता है।
अनुशीलन-इस प्रसंग में शून्य के साथ विविध संख्याओं के होने पर
गणितीय संक्रियाओं के परिणाम बताए गए हैं। ये परिणाम इस प्रकार प्रकट किये
जा सकते हैं-
प्रथम नियम के अनुसार ⇒ 0+a = a
द्वितीय नियम के अनुसार ⇒ a±0 = a
तृतीय नियम के अनुसार ⇒ 0×a = 0
चतुर्थ नियम के अनुसार ⇒ a×0 = 0
तृतीय नियम के 'आदि' पद के अनुसार ⇒ 0² = √0, 0³ = ³√0 = 0
साथ ही 'आदि' पद के अनुसार ⇒ 0/a = 0
१. तुल. पाटी-गणित सू. 20, ग.सा.सं. 2.1 गणित तिलक पृ. 4 -5 गणित कौमुदी पृ. 4
२. तुल. पाटी-गणित सू. 21, ग.सा.सं. 1.49 महासिद्धान्त 5.10
त्रिशतिका 15
यह ध्यान देने योग्य है कि तृतीय तथा चतुर्थ नियम के अनुसार गुणन की
दो स्थितियों की परिकल्पना की गई है तथा दोनों का परिणाम 0 बताया गया है।
आधुनिक गणित में दोनों मान्य हैं तथा इन्हें सिद्ध भी किया जा सकता है-
0×a = 0 सही है, क्योंकि 0/a = 0
इसके सही सिद्ध होने पर गुणन में क्रम-विनिमेय गुण लागू होने के कारण
a×0 = 0 भी सही सिद्ध होता है।
इस प्रकार शून्य को किसी राशि से भाग करने पर उसका फल भी शून्य
होता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि शून्य से किसी राशि को भाग देने से
उसके भागफल के विषय में सावधानीपूर्वक कुछ नहीं कहा है। इस प्रकार उन्होंने
a/0 के अपरिभाष्य होने का संकेत दिया है। आधुनिक गणित में इसे अपरिभाष्य
मानते हुए इस संक्रिया का प्रतिषेध किया जाता है¹। क्योंकि यह एक गलत
परिणाम की ओर अग्रसर करती है। उदाहरणतः, यदि 5/0 = 0 हो तो उसका अर्थ
यह होना चाहिए कि 0×0 = 5, जो कि सर्वथा गलत है। सभी प्राचीन या अद्यतन
विद्वान् 0×0 या 0² = 0 ही मानते हैं। इस प्रकार त्रिशतिकाकार के मत से भी यह
संक्रिया अपरिभाष्य है।
उदाहरणानि
षण्णवतिद्विकमेकं चैकद्विगुणानि षण्णवाष्टौ च।
सप्तत्रिगुणान् पञ्चषट्खाष्टौ च कुरु षष्टिगुणान्॥ ३॥
न्यासः । गुण्यः 1296। गुणकः 21। गुण्यः 896। गुणकः 37। गुण्यः
8065। गुणकः 60। लब्धं यथाक्रमम् 27216। 33152। 483900।।
सुक्षेमा अनुवाद-1296 को 21 से, 896 को 37 से 8065 को 60 से
गुणित करो।
इनका गुणनफल उक्त व्याख्या में ही अंकित कर दिया गया है।
अन्यदुदाहरणम्
एकादिनवान्तानि त्रिपञ्चसप्ताहतानि कथय।
त्र्यादिषडन्तानि तथा द्विशून्यसप्ताष्टगुणितानि॥ ४॥
न्यासः।। गुण्यः 987654321। गुणकः 753। गुण्यः 6543। गुणकः
8702। लब्धं यथाक्रमम् 743703703713। 56937186। एवं प्रत्युत्पन्नः समाप्तः।
१. Division by zero is prohibited, for this operation is undefined. - Scientific
Encyclopedia, U.S.A. on the word 'zero'
16 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-1 से लेकर 9 तक (इकाई दहाई के क्रम से स्थानीय
मान के अनुसार लिखी संख्याओं) को 753 से गुणा करने पर तथा 3 से 6 तक
उसी क्रम से लिखी संख्याओं को 8702 से गुणित करने पर गुणनफल क्या होगा।
बताओ।
गुणनफल व्याख्या में अंकित कर दिया गया हैं।
भागहारे करणसूत्रम्
तुल्येन सम्भवे सति हरं विभाज्यं च राशिना छित्त्वा।
भागो हार्यः क्रमशः प्रतिलोमं भागहारविधिः¹॥ ९॥
प्राग्लब्धप्रत्युत्पन्नफलानां स्वगुणभक्तानां न्यासः।।
भाज्यः 27216। भाजकः 21। लब्धिः 1296। भाज्यः 33152। भाजकः
37। लब्धिः 896। भाज्यः 483900। भाजकः 60। लब्धिः 8065। भाज्यः
743703703713। भाजकः 753। लब्धिः 987654321 भाज्यः 56937186
भाजकः 8702 लब्धिः 6543। एवं भागहारः समाप्तः।
सुक्षेमा अनुवाद-यदि सम्भव हो तो हर या भाजक तथा भाज्य दोनों को
किसी तुल्य या समान राशि से विभाजित करके भाज्य को भाजक की उस पहली
राशि से विभाजित करके भाजक की लब्धि से भाज्य की लब्धि को भाग देते हुए
हार्य या विभाज्य बनाने पर तो प्रतिलोम भागहार विधि होती है।
अनुशीलन-भाग की यह संक्रिया निम्न चरणों में प्रकट की जा सकती है-
यदि यह सम्भव हो कि-
भाज्य ÷ a तथा भाजक = axb
तो-
(I) भाज्य ÷ a तथा भाजक ÷ a
(II) भाज्य की लब्धि ÷ भाजक की लब्धि (b) = भाज्य ÷ भाजक
उदाहरण के लिये जिन संख्याओं को पहले गुणित किया गया है, उनके
गुणनफल को भाग के लिये प्रस्तुत करते हैं। जैसे-
27216 ÷ 21, 21 = 7×3
अतः 27216 ÷ 7 = 3888 तथा 21 ÷ 7 = 3
3888 ÷ 3 = 1296 अतः 27216 ÷ 21 = 1296
१. पाटी-गणित सू. 22, ग.सा.सं. 1.49
त्रिशतिका 17
वर्गे करणसूत्रमार्याद्वयम्
कृत्वान्त्यपदस्य कृतिं शेषपदाद् द्विगुणमन्त्यमभिहन्यात्।
उत्सार्योत्सार्य पदाच्छेषं चोत्सारयेत् कृतये।। १०।।
सदृशद्विराशिघातो, रूपादिद्विचियपदसमासो वा।
इष्टोनयुतवधो वा तदिष्टवर्गान्वितो वर्गः।। ११।।
सुक्षेमा अनुवाद-'कृति' अर्थात् वर्ग करने के लिये संख्या के अन्तिम पद
(सबसे बाएँ ओर) का वर्ग करके शेष पद से द्विगुण अन्तिम पद को गुणित करे।
इस प्रकार क्रमशः अन्तिम पद (a) को छोड़ते हुए आगे वाले शेष पद (b) के साथ
वही पूर्वोक्त किया करने से सम्पूर्ण संख्या का वर्ग प्राप्त होता है।
अनुशीलन-उदाहरणतः 34 संख्या के वर्ग के लिये-
अन्तिम संख्या 3 का वर्ग 9
शेष पद 4 से द्विगुणित अन्तिम (3) का गुणन 24
शेष पद 4 से पूर्वोक्त किया वर्ग 16
1156
प्राचीन गणित की यह विधि (a+b)²=a²+2ab+b² की सर्वसमिका पर
आधारित है। पूर्वोक्त उदाहरण में वस्तुतः 900+240+16 यही संक्रिया की गई है।
वर्ग का अर्थ- I. 'सदृशद्विराशिघातः'- समान दो संख्याओं का आपस में
गुणित करना ही वर्ग है¹।
II. रूपादिद्विचियपदसमासो वा-रूप अर्थात् 1 से प्रारम्भ करके उसमें
क्रमशः 2 से युक्त चय या समूह को जोड़ते हुए प्राप्त क्रमिक संख्याओं का जोड़
ही (उस पद संख्या का) वर्ग है।
III. इष्टोनयुतवधो वा---जिस संख्या का वर्ग करना है, उसमें से किसी
इष्ट संख्या को घटावें तथा उसमें उसी को जोड़ें। पुनः प्राप्त संख्याओं को आपस
में गुणित करें तथा गुणनफल में उस पूर्वोक्त इष्ट संख्या के वर्ग को जोड़े। यही
उस पूर्वोक्त संख्या का वर्ग होता है²।
१. वर्ग का यह अर्थ तथा इसकी पूर्वोक्त रीति लीलावती से शब्दशः तुलनीय है-
समद्विघातः कृतिरुच्यतेऽथ स्थाप्योऽन्त्यवर्गो द्विगुणान्त्यनिघ्नाः।
स्वस्वोपरिष्टाच्च तथापरेऽङ्कास्त्यक्त्वाऽन्त्यमुत्सार्य पुनश्च राशिम्।।
लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 8
तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.63 ग.सा.सं. 2.29.31 ग.कौ.पृ. 6 ग.ति.पृ. 7।
२. तुल. इष्टोनयुग्राशिवधः कृतिः स्यादिष्टस्य वर्गेण समन्वितो वा - लीलावती, अभित्रपरिकर्माष्टकम्
श्लोक 9, पृ. 22
18 त्रिशतिका
11वें श्लोक के प्रथम उपभेद में वर्ग की सुन्दर परिभाषा दी गई है।
द्वितीय उपभेद से वर्ग का यह महत्त्वपूर्ण नियम प्राप्त होता है- ‘1
से लेकर क्रमिक धनात्मक विषम संख्याओं का जोड़ उन पदों की गिनती
का वर्ग होता है’। जैसे-
1+3+5+7+9 = 5² क्योंकि यहाँ 5 पद हैं। अतः इनका जोड़ 5 का वर्ग है।
इस नियम से हमें यह सूत्र प्राप्त होता है-
1 से क्रमिक विषम संख्याओं का योग = पदों की संख्या² या n²
अथवा ⎛ अन्तिम विषम संख्या +1 ⎞²
⎜ --------------------- ⎟
⎝ 2 ⎠
इसकी उपपत्ति के लिये संक्षेप शब्द-
सबसे पहली संख्या आदिधन (a)
संख्याओं का सामान्य अन्तर, चय, Common difference=d
1 आदि क्रमिक संख्याओं के सर्वधन का सामान्य सूत्र ⇒ n{2a+(n-1)d}
2
1+3+5+7+9-- में 2 के अन्तर से क्रमिक संख्याओं के योग की स्थिति में
a = 1, d = 2 अतः इस स्थिति में-
1+3+5----+n = n {2 + (n-1) × 2} 5 {2+ (5-1) ×2}
2 2
⇒ n (2+2n-2) ⇒ 5 (2+10-2)
2 2
⇒ n × 2n ⇒ n² ⇒ 5×10 = 50 = 25 = 5²
2 2 2
तृतीय उपभेद की उपपत्ति प्राचीन गणित में प्रचलित एक प्रसिद्ध नियम
‘वर्गान्तरं तु योगान्तरघातसमो भवति’ से प्राप्त होती है। इसका अर्थ यह है किन्हीं
दो संख्याओं के वर्ग का अन्तर ⇒ उन संख्याओं के योग उन्हीं संख्याओं के घटाव
के पश्चात् उन दोनों प्राप्त संख्याओं के गुणनफल के समतुल्य होता है। इससे हमें
गणितशास्त्र में प्रसिद्ध यह सर्वसमिका प्राप्त होती है-
a² -b² = (a+b) (a-b)
त्रिशतिका 19
इस आधार पर प्रस्तुत तृतीय उपभेद के लिये यह सूत्र अनायास प्राप्त होता
है-
a² = (a+b) (a-b) + b²
उदाहरणम्
एकादिनवान्तानां पञ्चकृतेस्त्रिषष्टेश्च।
द्वित्रिचतुर्णां च कृतिं वद द्विशून्याष्टसप्तानाम्¹।। ५।।
न्यासः।। 1 । 2 । 3 । 4 । 5 । 6 । 7 । 8 । 9 । 25 । 36 । 63 । 432 । 7802। लब्धा यथाक्रमं
वर्गराशयः 1 । 4 । 9 । 16 । 25 । 36 । 49 । 64 । 81 । 625 । 1296 । 3969 । 186624 ।
60871204। इति वर्गः।।
सुक्षेमा अनुवाद-1 से लेकर 9 तक तथा 5 की कृति या वर्ग अर्थात् 25,
63, 432 तथा 7802 के वर्ग बताओ।
अनुशीलन-1 से 9 तक वर्ग स्पष्ट हैं। अतः 25 से आगे प्रथम उपभेद के
अनुसार वर्ग प्रस्तुत करते हैं-
वर्ग के प्रथम सूत्र के अनुसार 432 के वर्ग को प्राचीन लेखन पद्धति के
अनुसार प्रस्तुत करते हैं-
43² = 1849
2×43×2 = 172
2² = 4
—————————
186624
यह विधि द्विपद के वर्ग की सर्वसमिका पर अवलम्बित है। अथवा इसे
त्रिपद बनाकर प्राचीन विधि को अन्वित करते हैं-
432² = 4² = 16
2×4×3 = 24
3² = 9
2×43×2 = 172
2² = 4
—————————
186624
यह विधि (a+b+c)²=a²+2ab+b²+2ac+2bc+c² इस सर्वसमिका पर
आधारित है। आगे चल कर भास्कराचार्य आदि ने इसका स्पष्ट वर्णन किया है।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 4
20 त्रिशतिका
आगे तृतीय उपभेद के अनुसार इनका वर्ग प्रस्तुत करते हैं-
संख्या तृतीय उपभेद के सूत्र के अनुसार संक्रिया प्राप्त परिणाम
25² (25+5) (25-5) + 5² = 30×20+25 = 625
36² (36+4) (36-4) + 4² = 40×32+16 = 1296
63² (63+7) (63-7) + 7² = 70×56+49 = 3969
432² (432+32) (432-32) + 32² = 464×400+1024 = 186624
7802² (7802+802) (7802-802) + 802² = 8604×7000+643204
= 60871204
वर्गमूले करणसूत्रमार्याद्वयम्
विषमात् पदतस्त्यक्त्वा वर्गं स्थानच्युतेन मूलेन।
द्विगुणेन भजेच्छेषं लब्धं विनिवेशयेत् पंक्त्याम्॥ १२॥
तद्वर्गं संशोध्य द्विगुणीकुर्वीत पूर्वलब्धं यत्।
उत्सार्य ततो विभजेच्छेषं द्विगुणीकृतं दलयेत्१॥ १३॥
उदाहरणम्
प्राग्लब्धवर्गाणां न्यासः।। 1। 4। 9। 16। 25। 36। 49। 64। 81। 625। 1296। 3969।
186624। 60871204।। लब्धमेतेषां मूलम् 1। 2। 3। 4। 5। 6। 7। 8। 9। 25। 36। 63।
432। 7802। इति वर्गमूलम्॥
सुक्षेमा अनुवाद-अन्तिम विषम स्थान वाले अंक (सबसे बाई ओर का)
में से (महत्तम सम्भव) वर्ग संख्या को घटाकर उस वर्ग की वर्गमूल संख्या को
दूना करके सम अंक में भाग दें। पुनः लब्धि को द्विगुणीकृत वर्गमूल वाली पंक्ति
में स्थापित करें। पुनः उस लब्धि के वर्ग को अगली संख्या से संशोधित करें या
घटावें। इस प्रकार जब तक संख्या समाप्त न हो तब तक भाग आदि की क्रिया
करने से वर्गमूल प्राप्त होता है।
इससे पूर्व जिन संख्याओं का वर्ग किया गया है, उन्हीं संख्याओं का वर्गमूल
इस विधि के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। पुनरपि 186624 का वर्गमूल इस विधि
से प्रस्तुत करते हैं-
१. तुल. पाटी-गणित सू. 25-26। ग.सा.सं. 2.36, ग.कौ.पृ. 9, म.सि. 15.6 लीलावती
अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 10
त्रिशतिका 21
पहले संख्या के ऊपर सम (-) विषम (।) चिह्न लगाते हैं। इससे जितने
जोड़े बनेंगे, वर्गमूल में उतने ही अंक प्राप्त होंगे-
- । - । - ।
1 8 6 6 2 4
4² 16
────
26
2×4×3 24
────
26
3² 9
────
172
2×43×2 172
────
4
2² 4
────
×
स्पष्टतः यहाँ उपरिलिखित वर्ग की विलोम संक्रिया की गई है।
घने करणसूत्रमार्याद्वयम्
स्थाप्योऽन्त्यघनोऽन्त्यकृतिः स्थानाधिक्यं त्रिपूर्वगुणिता च।
आद्यकृतिरन्त्यगुणिता त्रिगुणा च घनस्तथाद्यस्य।। १४।।
निर्यूक्तराशिरन्त्यस्तथा घनोऽसौ समत्रिराशिहतिः।
खैकादिचयेनान्त्ये त्र्यादिहते वा युतिः सैके¹।। १५।।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी संख्या का घन प्राप्त करने के लिये पहले अन्तिम
संख्या (सबसे बाईं ओर वाली) का घन करें। इसके पश्चात् उसी संख्या का वर्ग
तथा उसे त्रिगुणित करें तथा इससे आगे वाली संख्या से गुणित करें। पुनः इस आगे
वाली संख्या के वर्ग को अन्तिम संख्या से गुणित तथा 3 से गुणित करें। इसके
पश्चात् आगे वाली संख्या का घन करें। इन्हें स्थानान्तर से लिखकर जोड़ने से घन
प्राप्त होता है।
────────────────────────────────────────────────────────────
१. पाटी-गणित सू. 27-28, ब्रा.स्फु.सि. 12.6, ग.सा.सं. 2.47, ग.ति.पृ. 11, ग.कौ.पृ. 7-8,
लीलावती
22 त्रिशतिका
अनुशीलन-संख्याओं के घन की यह विधि मूलतः ब्रह्मगुप्त ने विनिर्दिष्ट
की है¹।
घन की यह प्रथम प्राचीन विधि स्पष्टतः द्विपद के घन की इस सर्वसमिका
पर अवलम्बित है-
(a+b)³=a³+3a²b+3ab²+b³
घन की परिभाषा-घनोऽसौ समत्रिराशिहतिः- घन का अर्थ 3 समान
संख्याओं का आपस में गुणन करना है। इसमें वह (बाईं ओर) निर्दिष्ट संख्या
‘निर्युक्तराशि’ है।² इसे ‘अन्त्य’ नाम दिया गया है। इसके अनुसार घन का सूत्र इस
प्रकार है-
a³ = axaxa
घन का अन्य प्रकार-खैकादिचयेना--- घन की विधि यह है कि अन्त्य
या निर्दिष्ट राशि (a) में ‘खैकादिचय’ अर्थात् 0+1+2 = 3 से अथवा ‘त्र्यादि’
अर्थात् 3 तथा आदि अर्थात् निर्दिष्ट राशि वाले अंक से पहले वाले याने उपान्तिम
अंक (a-1) से गुणा करे, उसमें 1 जोड़े। पुनः उसमें ‘स्वाद्यंकघन’ (यह
त्रिशतिका 23
इस विधि से हमने पूर्वोक्त सूत्र पुनः प्राप्त कर लिया है। इससे (a+b)³ इस
द्विपद के घन के लिये भी समकक्ष सूत्र प्राप्त किया जा सकता है। पर वहाँ b का
अर्थ केवल 1 होगा। अतः a = कोई संख्या, b = 1 मानकर समकक्ष सूत्र इस प्रकार
है-
(a+b)³ = a³+3a (a+b) + b
[नोट ⇒ b = 1]
आगे चलकर भास्कराचार्य ने इस सूत्र के आधार पर b = किसी भी संख्या
मानते हुए (a+b)³ के लिये सूत्र विकसित किया¹, जिसके अनुरूप आधुनिक गणित
में (a+b)³ = a³+3ab (a+b) + b³ सूत्र पर्याप्त प्रसिद्ध है।
उदाहरणम्
एकस्य नवानां पञ्चदशानां को घनो भवति।
षट्पञ्चद्विकराशेस्त्रिखद्विराशेश्च कथयाशु²।। ६।।
न्यासः।। 1। 9। 15। 203। 256। जाता यथाक्रमं घनाः।। 1। 729। 3375।
8365427। 16777216। इति घनः।
सुक्षेमा अनुवाद-1, 9, 15 का तथा 203, 256 का घन क्या होता है, शीघ्र
बताओ।
अनुशीलन-प्राप्त सूत्र के अनुसार 9 संख्या का घन इस प्रकार प्राप्त होगा-
सूत्र उदाहरण
a³ = (a-1)³ + 3a (a-1) + 1 9³ = (9-1)³ + (3×9×8) + 1
⇒ 512+216+1 = 729
द्विपद के घन के सूत्र के अनुसार- (b=1)
(a+b)³ = a³ +3a (a+b) + b (8+1)³ = 8³+(3×8×9) + 1
⇒ 512+216+1 = 729
इससे यह भी स्पष्ट है कि 9³ = (7³) + (3×8×7) + 1+217 अर्थात्
343+169+217 = 729 अथवा 9³ = (6³) + (3×7×6) +1+217+169 = अर्थात्
216+127+217+169=729 इस प्रकार श्रेणी अनुक्रम से समीकरण प्राप्त होते हैं।
१. खण्डाभ्यां वा हतो राशिस्त्रिघ्नः खण्डघनैक्ययुक्। - लीलावती श्लोक 13
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 5
24 त्रिशतिका
अन्य उदाहरणों का प्रथम सूत्र के अनुसार घन इस प्रकार है-
घन प्रस्तुत सूत्र के अनुसार संक्रिया प्राप्त परिणाम
15³ =(10+5)³=10³+3×10²×5+3×10×5²+5³
⇒1000+1500+750+125 =3375
203³ = (200+3)³=200³+3×200²×3+3×200×3²+3³
⇒8000000+360000+5400+27 =8365427
256³=(250+6)³=250³+3×250²×6+3×250×6²+6³
⇒15625000+1125000+27000+216=16777216
प्राचीन गणित में इस विधि को लिखने का प्रकार भिन्न था। उदाहरणतः
256³ के लिये इस विधि को इस प्रकार लिखा जाता था-
256³=25³ =15625
3×25²×6 = 11250
3×25×6² = 2700
6³ = 216
16777216
इन उदाहरणों का द्वितीय सूत्र के अनुसार घन इस प्रकार है-
15³ 14³+ (3×15×14) +1
= 2744+630+1 = 3375
203³ 202³+ (3×203×202) +1
= 8242408+123018+1 = 8365427
256³ = 255³+ (3×256×255) +1
= 16581375+195840+1 = 16777216
घनमूले करणसूत्रमार्यात्रयम्
घनपदमघनपदे द्वे घनपदतोऽपास्य घनमतो मूलम्।
संयोज्य तृतीयपदस्याधस्तदनष्टवर्गेण।। १६।।
एकस्थानेन तथा शेषं त्रिगुणेन सम्भजेत् तस्मात्।
लब्धिं निवेश्य पङ्क्त्यां तद्वर्गं त्रिगुणमन्त्यहतम्।। १७।।
जह्यादुपरिगराशेः प्राग्वद्घनमादिमस्य च स्वपदात्।
भूयस्तु तृतीयपदस्याथ इत्यादि विधि मूलम्।। १८।।
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.7। पाटी-गणित सू. 29-31, ग.सा.सं. 2.53-54 म.सि. 15.9-10, सि.
शे. 13.6-7, ग.कौ.पृ. 8-9, लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 14-15
त्रिशतिका 25
उदाहरणम्
प्राग्लब्धघनानां न्यासः 1।729।3375।16777216।8365427। लब्धानि
मूलानि 1।9।15।256।203। इति घनमूलम्।
सुक्षेमा अनुवाद-घनमूल के लिये पहले संख्या की इकाई में घन का चिह्न
(।) तथा उससे पहले दो अंकों में अघन का चिह्न (--) लगावें। पुनः अन्तिम
घन पद (सबसे बाईं ओर वाले) से अधिकतम सम्भव बड़े घन (a³) को घटावें
तथा उसे अन्तिम घन के नीचे रखें। पुनः आगे वाली शेष संख्या को त्रिगुणित
घनमूल के वर्ग (3a²) गुणित लब्धि (b) से भाग देवें। पश्चात् त्रिगुणित घनमूल
तथा उस लब्धि के वर्ग (3ab²) से भाग देवें तथा पूर्व के समान अन्तिम अघन
में से घटावें। यही संक्रिया इसके तृतीय पद के साथ तथा उसके आगे भी करने
से घनमूल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-घनमूल की आधुनिक विधि में किसी संख्या के लघुतम संख्या
से भाग करके भाजकों के एक ही प्रकार के 3-3 अंकों वाले समूह बन जाते हैं।
इन समूहों में से एक-एक संख्या लेकर उनका गुणनफल ही उस संख्या का
घनमूल होता है। उदाहरण में पूर्वोक्त घन संख्याओं का ही घनमूल बताया गया है।
पूर्वोक्त विधि का अनुसरण करते हुए 16777216 का घनमूल सिद्ध करते
हैं-
- । - - । - - ।
1 6 7 7 7 2 1 6
. 2³ 8
─────
87
3×2²×5 60
─────
277
3×2×5² 150
─────
1277
5³ 125
─────
11522
3×25²×6 11250
─────
26 त्रिशतिका
2721
3×25×6² 2700
――――――
216
6³ 216
――――――
×
यहाँ भी घन की पूर्वोक्त संक्रिया से विलोम संक्रिया द्वारा घनमूल प्राप्त
किया गया है। प्रस्तुत संक्रिया में घन की संख्याएँ ही घनमूल के अंक बनते हैं।
अतः इसका घनमूल 256 है।
भिन्नसंकलिते करणसूत्रमार्यापूर्वार्धम्।
सदृशच्छेदांशयुतिः छेदनमच्छेदनस्य रूपं स्यात्¹।
भिन्न के योग के सूत्र के लिये श्लोकार्ध—
सुक्षेमा अनुवाद—समान छेद या हर बनाने के पश्चात् भागफल को अंश
के साथ उतनी बार जोड़ने से भिन्न संख्याओं का योग होता है। इससे सम्पूर्ण
संख्याओं का एक हर बनता है।
उदाहरणम्
पादत्र्यंशषडंशान् द्वादशभागं च कथय संक्षिप्य।
सदलद्वि-पादवर्जितरूपत्रयं रूपषटकं च²॥ ७॥
न्यासः 1/4 1/3 1/6 1/12 अत्र छेदसादृश्यार्थं वक्ष्यमाणभागजातौ करणसूत्रम्।
छेदाभ्यामन्योन्यं हन्याच्छेदांशकौ समुच्छित्त्यै।
सदृशयोजनाल्लब्धम् 5/6।
द्वितीयोदाहरणे न्यासः 2 3
1/2 1̇/4 6/1 अत्रापि कलासवर्णनार्थं भागानुबन्धभागापवाहजातौ
च करण-सूत्रम्।
भागानुबन्धजातौ रूपगुणच्छेदसंगुणः सांशः।
भागापवाहजातौ शोध्योंशच्छेदगुणितरूपेभ्यः।
एवं सवर्णनं छेदसादृश्यं च कृत्वा अंशयोजनाल्लब्धम् 45/4 इति भिन्नसंकलितम्॥
――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.2, पाटी-गणित सू. 32, म.सि. 15.14 ग.ति.पृ. 15, सि.शे. 13.8
२. पाटी-गणित उदा. 6
त्रिशतिका 27
सुक्षेमा अनुवाद- ¼ ⅓ ⅙ तथा ¹/₁₂ का योग बताओ तथा दल या अर्धसहित
2 अर्थात् 2½ या ⁵/₂ पाद या चौथाई रहित 3 अर्थात् 3-¼ = 2¾ या ¹¹/₄ तथा 6 या ⁶/₁
का जोड़ क्या होगा, बताओ।
अनुशीलन- यहाँ भिन्न संख्याओं के योग की विधि बताई है। इसके लिये
पहला नियम यह है कि हर संख्याओं को समान बनाएं। इसका प्रकार
'छेदाभ्यामन्योन्यं'---द्वारा व्याख्या में तथा आगे सूत्र 23 पृ. 27 में वर्णित है।
इसके अनुसार छेद या हर को एक दूसरे से गुणा करने पर सदृशच्छेद बनता है।
इसके पश्चात् प्रत्येक हर का इस सदृशच्छेद से या पूर्वोक्त गुणनफल से भाग देने
पर तथा भागफल को अंश से गुणित करके प्राप्त संख्याओं के योग से भिन्न
संख्याओं का योग होता है। जैसे पूर्वोक्त उदाहरण में हर संख्याओं का आपस में
गुणन तथा प्रत्येक हर का गुणनफल से भाग तथा भागफल का अंश से गुणन से-
¼ + ⅓ + ⅙ + ¹/₁₂ = (216+288+144+72) / 86
(720 ÷ 144) / (864 ÷ 144) = ⅚
हम जानते हैं कि ल.स.प. के उपयोग द्वारा इसे आसानी से हल किया जा
सकता है। सर्वप्रथम महावीराचार्य ने ल.स.प. का 'निरुद्ध' नाम देते हुए इसकी
विधि बताई है। पर श्रीधराचार्य तथा आगे भास्कराचार्य ने भी इसका उपयोग नहीं
किया। इसका उपयोग करने पर-
¼ + ⅓ + ⅙ + ¹/₁₂ = (3+4+2+1) / 12 = ¹⁰/₁₂ = ⅚
द्वितीय उदाहरण-
⁵/₂ + ¹¹/₄ + ⁶/₁ = (20+22+48) / 8 = ⁹⁰/₈ = ⁴⁵/₄ या ल.स.प के द्वारा (10+11+24) / 4 = ⁴⁵/₄ = 11¼
व्यवकलितसूत्रं परार्धम्
तुल्यच्छेदाद्यान्यराश्योरंशान्तरं कुर्यात्॥ १९॥
भिन्न राशियों को घटाने के लिये श्लोक का उत्तरार्ध-
१. तुल्यच्छेदायव्यराश्यो....पाटी-गणित सूत्र 32 तथा तुल.ब्रा.स्फु.सि. 12.2 म.सि. 15.14, ग.
ति.पृ. 18 सि.शे. 13.8, लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 4
28 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-समान छेद या हर बनाकर उसके आय वाले अंश से दूसरे
व्यय वाले अंश को घटाने पर भिन्न संख्याओं का व्यवकलन होता है। (यह 'पाटी
गणित' में पाठान्तर की सहायता से अर्थ है।)
उदाहरणम्
अर्धत्र्यंशषडंशान् रूपात संशोध्य कथय शेषम्।
रूपत्रयमर्धोनं द्वे त्र्यंशयुते च कथय पञ्चभ्यः।। ८।।
न्यासः १/२ १/३ १/६ १/१ शेषं०। द्वितीयोदाहरणे न्यासः २ २ । ५ लब्धं शेषम्।
१/६ इति भिन्न-व्यवकलितम्। १/२ १/३
सुक्षेमा अनुवाद-१/२ १/३ तथा १/६ के योग को रूप या 1 से घटाने पर क्या
शेष बचेगा। 3 में से आधा कम तथा 2 तथा तीसरे अंश के योग को 5 से घटाने
पर क्या बचेगा।
अनुशीलन- प्रथम उदाहरण-
१/२+१/३+१/६ = १/१ - १/१ = 0
द्वितीय उदाहरण-
2½+2⅓ = 5/2+7/3 = 29/6 , 5/1 - 29/6 = (30-29)/6 = 1/6
भिन्नप्रत्युत्पन्ने सूत्रम्
प्रत्युत्पन्नफलं स्यादंशवधे छेदघातसंभक्ते१।
सुक्षेमा अनुवाद-छेद या हर का आपस में गुणा करके गुणनफल से अंश
के गुणनफल को विभाजित करने पर भिन्न का गुणन होता है।
उदाहरणम्
रूपत्रयमर्धफलं गुणितं, पादान्वितेन रूपेण।
अर्धं च पादगुणितं किं भवति धनं पृथक् कथय।। ९।।
न्यासः 3 1 ½ ¼ लब्धं यथाक्रमम् 35/8 ⅛ इति भिन्नप्रत्युत्पन्नः।
½ ¼
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.3 पाटी-गणित सू. 33, ग.सा.सं.3.2, म.सि. 15.15. ग.ति.पृ. 19,
लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 4
त्रिशातिका 29
सुक्षेमा अनुवाद-3 रूप के साथ आधा फल अर्थात् 3½ को चतुर्थांश से
युक्त 1 अर्थात् 1¼ के साथ गुणनफल क्या होगा तथा आधा या ½ संख्या चौथाई
या ¼ से गुणित होने पर क्या उत्तर होगा, यह अलग बताओ।
अनुशीलन- पूर्वोक्तानुसार संक्रिया करने पर-
3½×1¼ = ⁷/₂×⁵/₄ = ³⁵/₈ = 4⅜ , ½×¼ = ⅛
भिन्नभागहारे सूत्रम्
छेदांशविपर्यासे हरस्य विहिते विधिः पूर्वः१॥ २०॥
सुक्षेमा अनुवाद-हर तथा अंश को विपर्यास क्रम से रखने पर अर्थात् हर
को अंश तथा अंश को हर बनाकर रखने पर पूर्वोक्त गुणन की रीति से विधि
करने पर भाग होता है।
उदाहरणम्
सार्धद्वयेन भक्ताः षट् पादयुतास्तथा त्रिभिः सार्धैः।
पादयुतरूपषष्टिः संभक्ता कथय भागाप्तम्॥ १०॥
2 6 3 60 लब्धं यथाक्रमम् ⁵⁰/₂₀ ⁴⁸²/₂₈ इति भिन्न-भागहारः
½ ¼ ½ ¼
सुक्षेमा अनुवाद-चौथाई सहित 6 अर्थात् 6¼ को आधा सहित 2 या 2½ से
भाग दीजिये। साथ ही चौथाई सहित 60 या 60¼ को आधे सहित 3 या 3½ से
भाग कर भागफल बताइये।
यहाँ पूर्वोक्त विधि अनुसार-
6¼ ÷ 2½ = ²⁵/₄ ÷ ⁵/₂ = ²⁵/₄ײ/₅ = ⁵⁰/₂₀ = ⁵/₂
60¼ ÷ 3½ = ²⁴¹/₄ ÷ ⁷/₂ = ²⁴¹/₄ײ/₇ = ⁴⁸²/₂₈ = ²⁴¹/₁₄
भिन्नवर्गे सूत्रम्
अंशकृतौ भक्तायां छेदनवर्गेण भिन्नवर्गफलम्२।
सुक्षेमा अनुवाद-अंश की कृति या वर्ग अर्थात् उसी संख्या से गुणन तथा
छेदन या हर का वर्ग करने पर भिन्न संख्याओं का वर्गफल प्राप्त होता है।
१. तुल. ब्र.स्फु.सि. 12.4, पाटी-गणित सू. 33, ग.सा.सं. 3.8, म.सि. 15.15. ग.ति.पृ. 21
लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 5
२. ब्रा.स्फु.सि. 12.5, पाटी-गणित सू. 34, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.16 लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक
श्लोक 5
30 त्रिशतिका
उदाहरणम्
सार्धद्वयस्य वर्गं पादयुतानां च कथय पञ्चानाम्।
अर्धस्य त्र्यंशस्य च यदि वर्गविधिं विजानासि¹।। १९।।
न्यासः 2 5 ½ ⅓ यथाक्रमं वर्गराशयः 25/4 441/16 1/4 1/9
½ ¼
सुक्षेमा अनुवाद-2 सहित आधा या 2½, चौथाई सहित 5 या 5¼, तथा
आधा या ½ तथा तिहाई या ⅓ का वर्ग बताओ, यदि इसकी विधि जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
2½ = 5/2 = 25/4, 5¼ = 21/4 = 441/16, ½ = 1/4, ⅓ = 1/9
भिन्नवर्गमूले सूत्रम्
अंशस्य वर्गमूले छेदनमूलोद्धृते मूलम्²।। २१।।
उदाहरणम्
प्राग्लब्धवर्णानां न्यासः 25/4 441/16 1/4 1/9 लब्धानि मूलानि 5/2 21/4 1/2 1/3
सुक्षेमा अनुवाद-अंश का वर्गमूल तथा इसी प्रकार छेद या हर का वर्गमूल
करने पर भिन्न संख्याओं का वर्गमूल प्राप्त होता है।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
25/4 = 5/2, 441/16 = 21/4, 1/4 = 1/2, 1/9 = 1/3
घने करण-सूत्रम्
अंशस्य घनं विभजेच्छेदस्य घनेन घनफलं भवति³।
भिन्न संख्याओं का घन
सुक्षेमा अनुवाद-अंश का तथा छेद या हर का घन करने पर भिन्न
संख्याओं का घनफल प्राप्त होता है।
१. पाटी-गणित उदा. 12
२. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.5। पाटी-गणित सू. 34, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.16, ग.कौ.पृ. 23
लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 5
३. तुल. पाटी-गणित सू. 35, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.17, ग.कौ.पृ. 25
त्रिशतिका 31
उदाहरणम्
सप्तानां सार्धानां पञ्चदशानां च पादयुक्तानाम्।
पादस्य त्र्यंशस्य च कथय घनं यदि विजानासि।। १२।।
न्यासः 15/2 61/4 1/4 1/3 लब्धा यथाक्रमं घना 3375/8 226981/64 1/64 1/27
सुक्षेमा अनुवाद-आधा सहित 6 या 6½, चौथाई से युक्त 15 या 15¼ तथा
एक चौथाई या ¼, एक तिहाई ⅓ का घन बताओ, यदि जानते हो।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
7½ = 15/2 = (15×15×15)/(2×2×2) = 3375/8, 15¼ = 61/4 = (61×61×61)/(4×4×4) = 226981/64
¼ = 1/64, ⅓ = 1/27
घनमूले करण सूत्रम्
अंशघनमूलराशौ छेदनमूलोद्धृते मूलम्¹।
उदाहरणम्
प्राग्लब्धघनानां न्यासः 3375/8 226981/64 1/64 1/27
यथोक्तकरणेन लब्धानि घनमूलानि 15/2 61/4 1/4 1/3 इति घनमूलम्
भिन्न संख्याओं का घनमूल
सुक्षेमा अनुवाद-अंश की घनमूल राशि तथा छेदन या हर का घनमूल लेने
पर भिन्न संख्याओं का घनमूल प्राप्त होता है।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
3375/8 = 15/2, 226981/64 = 61/4, 1/64 = 1/4, 1/27 = 1/3
कलासवर्णने सूत्रम्
छेदाभ्यामन्योन्यं हन्याच्छेदांशकौ समुच्चित्यै²।
भिन्न संख्याओं के योग आदि का सूत्र
सुक्षेमा अनुवाद-भिन्न संख्याओं के योग आदि के लिये हर संख्याओं का
एक दूसरे से गुणा कर लेना चाहिये। ताकि हर से अंश तदनुरूप बन जावें।
१. तुल. पाटी-गणित सू. 35, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.17, ग.ति. पृ. 26, लीलावती
भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 5
२. अंशतः तुल. पाटी-गणित सू. 36, ब्रा.स्फु.सि. 12.2, म.सि. 15.13, ग.ति.पृ. 30, लीलावती
32 त्रिशतिका
उदाहरणम्
द्व्यादिषडन्तैश्छेदैरेकैकेनांशकेन को राशिः।
त्र्यादिनवान्तैश्च हरैर्द्व्यादिभिरंशैः समायोगे१।। १३।।
न्यासः 1/2 1/3 1/4 1/5 1/6 2/3 3/4 4/5 5/6 6/7 7/8 8/9 लब्धानि रूपाणि 7
भागाश्च 305/2020 इति भागजातिः
सुक्षेमा अनुवाद-ऐसी भिन्न संख्याएँ जिनके हर क्रमशः 2 से लेकर 6 हैं
तथा अंश सर्वत्र 1-1 हैं, इनका योग कौन राशि होगी। साथ ही 3 से लेकर 9 तक
हर संख्याओं वाली तथा 2 से लेकर 8 तक क्रमशः अंश संख्याओं वाली भिन्न
संख्याओं का योग क्या होगा।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
1/2 + 1/3 + 1/4 + 1/5 + 1/6 = (360+240+180+144+120) / 720 = 1044/720 ÷ 12 = 87/60
अथवा ल.स.प. लेकर = (30+20+15+12+10) / 60 = 87/60
2/3 + 3/4 + 4/5 + 5/6 + 6/7 + 7/8 + 8/9 =
(120960 + 136080 + 145152 + 151200 + 155520 + 158760 + 161280) / 181440
⟹ (1028952 ÷ 72) / (181440 ÷ 72) = 14291/2520
अथवा ल.स.प लेकर = (1680+1890+2016+2100+2160+2205+2240) / 2520 = 14291/2520
दोनों भिन्न योगों का योग = 87/60 + 14291/2520 = (3654+14291) / 2520 = 17945/2520 = 7 305/2520
अथवा 7 (305 ÷ 5) / (2520 ÷ 5) = 7 61/504
प्रभागजातौ सूत्रम्
छेदानामभ्यासः प्रभागजातौ भवेत् तथांशानाम्२।। २३।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 14
२. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.8। पाटी-गणित सू. 38। ग.सा.सं. 3.99। म.सि. 15.13, लीलावती
त्रिशतिका 33
सुक्षेमा अनुवाद-प्रभागजाति में छेद या हर का तथा उसी प्रकार उसके
अंशों का भी गुणन होता है।
उदाहरणम्
काकिण्यर्ध तस्मात् तृतीयभागस्ततश्च पञ्चांशः।
योगे कियद् धनं वद यदि गणितविधिं विजानासि॥ १४॥
1/1 1/2 1/1 1/2 1/3 1/1 1/2 1/3 1/5 लब्धा वराटका: 14
सुक्षेमा अनुवाद-एक काकिणी का आधा या 1/2 उसका 1/3 तथा उसका 1/5
जोड़ने से कितना धन होता है, बताओ, यदि गणितविधि को जानते हो।
यहाँ विविध हिस्सों के हिस्से प्राप्त करने के लिये आपस में गुणन तथा
उसके पश्चात् जोड़ होगा। अतः –
(1/1×1/2) + (1/2×1/3) + (1/2×1/3×1/5) = 1/2 + 1/6 + 1/30 = 21/30 = 7/10 काकिणी
क्योंकि 20 वराटक की 1 काकिणी, अतः 20×7/10 = 140/10 = 14 वराटक
अन्यदुदाहरणम्
सार्धद्वयस्य पादो रूपत्रितयस्य षोडशोंऽशश्च।
अष्टांशस्य दशांशत्रितयं योगे किमाचक्ष्व॥ १५॥
न्यासः 5/2 1/4 3/1 1/16 1/8 3/10 लब्धं भागाः 68/80 इति प्रभागजातिः।
सुक्षेमा अनुवाद-आधा सहित 2 अर्थात् 2 1/2 का एक चौथाई या 1/4 तथा 3
का सोलहवाँ अंश या 1/16 तथा 1/8 का 3/10 के साथ योग क्या होगा, बताओ।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार–
(5/2×1/4) + (3/1×1/16) + (1/8×3/10) = 68/80 = 17/20
भागानुबन्धजातौ सूत्रम्
भागानुबन्धजातौ रूपगुणच्छेदसंगुणः सांशः।
अथवान्यत् सूत्रम्
अधरहरच्छेदवधोऽधोंशयुतहरघ्न ऊर्ध्वांशः¹॥ २४॥
सुक्षेमा अनुवाद-भागानुबन्ध जाति में रूप या पूर्ण संख्या (a) से गुणित हर
(c) का अंश (b) के साथ जोड़ होता है।
१. अधरघ्नोर्ध्वहरेऽधोंशयुतहरघ्न आद्यंशः - पाटी-गणित सूत्र 39
तथा तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.9। ग.सा.सं. 3.113, म.सि. 15.11, लीलावती।