सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 208 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 53

त्रिशतिका 25
उदाहरणम्
प्राग्लब्धघनानां न्यासः 1।729।3375।16777216।8365427। लब्धानि
मूलानि 1।9।15।256।203। इति घनमूलम्।
सुक्षेमा अनुवाद-घनमूल के लिये पहले संख्या की इकाई में घन का चिह्न
(।) तथा उससे पहले दो अंकों में अघन का चिह्न (--) लगावें। पुनः अन्तिम
घन पद (सबसे बाईं ओर वाले) से अधिकतम सम्भव बड़े घन (a³) को घटावें
तथा उसे अन्तिम घन के नीचे रखें। पुनः आगे वाली शेष संख्या को त्रिगुणित
घनमूल के वर्ग (3a²) गुणित लब्धि (b) से भाग देवें। पश्चात् त्रिगुणित घनमूल
तथा उस लब्धि के वर्ग (3ab²) से भाग देवें तथा पूर्व के समान अन्तिम अघन
में से घटावें। यही संक्रिया इसके तृतीय पद के साथ तथा उसके आगे भी करने
से घनमूल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-घनमूल की आधुनिक विधि में किसी संख्या के लघुतम संख्या
से भाग करके भाजकों के एक ही प्रकार के 3-3 अंकों वाले समूह बन जाते हैं।
इन समूहों में से एक-एक संख्या लेकर उनका गुणनफल ही उस संख्या का
घनमूल होता है। उदाहरण में पूर्वोक्त घन संख्याओं का ही घनमूल बताया गया है।
पूर्वोक्त विधि का अनुसरण करते हुए 16777216 का घनमूल सिद्ध करते
हैं-

  • । - - । - - ।
    1 6 7 7 7 2 1 6
    . 2³ 8
    ─────
    87
    3×2²×5 60
    ─────
    277
    3×2×5² 150
    ─────
    1277
    5³ 125
    ─────
    11522
    3×25²×6 11250
    ─────