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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 208 में से

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पृष्ठ 54

26 त्रिशतिका
2721
3×25×6² 2700
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216
6³ 216
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यहाँ भी घन की पूर्वोक्त संक्रिया से विलोम संक्रिया द्वारा घनमूल प्राप्त
किया गया है। प्रस्तुत संक्रिया में घन की संख्याएँ ही घनमूल के अंक बनते हैं।
अतः इसका घनमूल 256 है।
भिन्नसंकलिते करणसूत्रमार्यापूर्वार्धम्।
सदृशच्छेदांशयुतिः छेदनमच्छेदनस्य रूपं स्यात्¹।
भिन्न के योग के सूत्र के लिये श्लोकार्ध—
सुक्षेमा अनुवाद—समान छेद या हर बनाने के पश्चात् भागफल को अंश
के साथ उतनी बार जोड़ने से भिन्न संख्याओं का योग होता है। इससे सम्पूर्ण
संख्याओं का एक हर बनता है।
उदाहरणम्
पादत्र्यंशषडंशान् द्वादशभागं च कथय संक्षिप्य।
सदलद्वि-पादवर्जितरूपत्रयं रूपषटकं च²॥ ७॥
न्यासः 1/4 1/3 1/6 1/12 अत्र छेदसादृश्यार्थं वक्ष्यमाणभागजातौ करणसूत्रम्।
छेदाभ्यामन्योन्यं हन्याच्छेदांशकौ समुच्छित्त्यै।
सदृशयोजनाल्लब्धम् 5/6।
द्वितीयोदाहरणे न्यासः 2 3
1/2 1̇/4 6/1 अत्रापि कलासवर्णनार्थं भागानुबन्धभागापवाहजातौ
च करण-सूत्रम्।
भागानुबन्धजातौ रूपगुणच्छेदसंगुणः सांशः।
भागापवाहजातौ शोध्योंशच्छेदगुणितरूपेभ्यः।
एवं सवर्णनं छेदसादृश्यं च कृत्वा अंशयोजनाल्लब्धम् 45/4 इति भिन्नसंकलितम्॥
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१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.2, पाटी-गणित सू. 32, म.सि. 15.14 ग.ति.पृ. 15, सि.शे. 13.8
२. पाटी-गणित उदा. 6