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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 208 में से

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पृष्ठ 42

14 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-गुण्य को (गुणक के) नीचे रखकर विलोम गति से या
अनुलोम मार्ग से कपाट सन्धि क्रम से एक-एक करके क्रमशः गुणा करें। इस क्रम
में प्रत्येक बार गुणक को खिसकाते हुए जिस जिससे गुणा किया गया है, उसमें
गुणन ठहरता है। इस प्रकार इसके कपाटसन्धि तथा तत्स्थ ये दो भेद होते हैं।
अनुशीलन-यहाँ 'प्रत्युत्पन्न' शब्द से गुणन की विधि बताई गई है। पाटी में
गुणक को बार-२ खिसका कर गुणक के इकाई अंक के ठीक नीचे रखने की
क्रिया के कारण इसका कपाट सन्धि नाम दिया गया है।
रूपस्थानविभागाद् द्विधा भवेत् खण्डसंज्ञकं करणम्।
प्रत्युत्पन्नविधाने करणान्येतानि चत्वारि¹।। ७।।
क्षेपसमं खं योगे राशिरविकृतः खयोजनापगमे
खस्य गुणनादिके खं, संगुणने खेन च खमेव²।। ८।।
सुक्षेमा अनुवाद-गुणन की 'खण्ड' संज्ञक विधि 'रूप विभाग' तथा
'स्थान विभाग' के भेद से दो प्रकार की होती है। प्रत्युत्पन्न या गुणन के विधान
में ये 4 प्रकार के करण या भेद होते हैं। (I) शून्य के साथ किसी राशि को जोड़ने
पर योगफल उस क्षेप राशि के बराबर होता है। (II) किसी राशि के साथ शून्य
को जोड़ने या उसमें से शून्य को निकालने पर वह राशि अविकृत या जैसी तैसी
बनी रहती है। (III) शून्य को किसी राशि से गुणित करने पर या 'आदि' पद के
अनुसार भाग, वर्ग, घन करने पर उनका फल 'ख' अर्थात् शून्य हो जाता है। (IV)
शून्य से किसी राशि को गुणित करने पर गुणनफल शून्य ही होता है।
अनुशीलन-इस प्रसंग में शून्य के साथ विविध संख्याओं के होने पर
गणितीय संक्रियाओं के परिणाम बताए गए हैं। ये परिणाम इस प्रकार प्रकट किये
जा सकते हैं-
प्रथम नियम के अनुसार ⇒ 0+a = a
द्वितीय नियम के अनुसार ⇒ a±0 = a
तृतीय नियम के अनुसार ⇒ 0×a = 0
चतुर्थ नियम के अनुसार ⇒ a×0 = 0
तृतीय नियम के 'आदि' पद के अनुसार ⇒ 0² = √0, 0³ = ³√0 = 0
साथ ही 'आदि' पद के अनुसार ⇒ 0/a = 0
१. तुल. पाटी-गणित सू. 20, ग.सा.सं. 2.1 गणित तिलक पृ. 4 -5 गणित कौमुदी पृ. 4
२. तुल. पाटी-गणित सू. 21, ग.सा.सं. 1.49 महासिद्धान्त 5.10