त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
DevanagariHindipublished208 पृष्ठ
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त्रिशतिका 21
पहले संख्या के ऊपर सम (-) विषम (।) चिह्न लगाते हैं। इससे जितने
जोड़े बनेंगे, वर्गमूल में उतने ही अंक प्राप्त होंगे-
- । - । - ।
1 8 6 6 2 4
4² 16
────
26
2×4×3 24
────
26
3² 9
────
172
2×43×2 172
────
4
2² 4
────
×
स्पष्टतः यहाँ उपरिलिखित वर्ग की विलोम संक्रिया की गई है।
घने करणसूत्रमार्याद्वयम्
स्थाप्योऽन्त्यघनोऽन्त्यकृतिः स्थानाधिक्यं त्रिपूर्वगुणिता च।
आद्यकृतिरन्त्यगुणिता त्रिगुणा च घनस्तथाद्यस्य।। १४।।
निर्यूक्तराशिरन्त्यस्तथा घनोऽसौ समत्रिराशिहतिः।
खैकादिचयेनान्त्ये त्र्यादिहते वा युतिः सैके¹।। १५।।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी संख्या का घन प्राप्त करने के लिये पहले अन्तिम
संख्या (सबसे बाईं ओर वाली) का घन करें। इसके पश्चात् उसी संख्या का वर्ग
तथा उसे त्रिगुणित करें तथा इससे आगे वाली संख्या से गुणित करें। पुनः इस आगे
वाली संख्या के वर्ग को अन्तिम संख्या से गुणित तथा 3 से गुणित करें। इसके
पश्चात् आगे वाली संख्या का घन करें। इन्हें स्थानान्तर से लिखकर जोड़ने से घन
प्राप्त होता है।
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१. पाटी-गणित सू. 27-28, ब्रा.स्फु.सि. 12.6, ग.सा.सं. 2.47, ग.ति.पृ. 11, ग.कौ.पृ. 7-8,
लीलावती