त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 17
वर्गे करणसूत्रमार्याद्वयम्
कृत्वान्त्यपदस्य कृतिं शेषपदाद् द्विगुणमन्त्यमभिहन्यात्।
उत्सार्योत्सार्य पदाच्छेषं चोत्सारयेत् कृतये।। १०।।
सदृशद्विराशिघातो, रूपादिद्विचियपदसमासो वा।
इष्टोनयुतवधो वा तदिष्टवर्गान्वितो वर्गः।। ११।।
सुक्षेमा अनुवाद-'कृति' अर्थात् वर्ग करने के लिये संख्या के अन्तिम पद
(सबसे बाएँ ओर) का वर्ग करके शेष पद से द्विगुण अन्तिम पद को गुणित करे।
इस प्रकार क्रमशः अन्तिम पद (a) को छोड़ते हुए आगे वाले शेष पद (b) के साथ
वही पूर्वोक्त किया करने से सम्पूर्ण संख्या का वर्ग प्राप्त होता है।
अनुशीलन-उदाहरणतः 34 संख्या के वर्ग के लिये-
अन्तिम संख्या 3 का वर्ग 9
शेष पद 4 से द्विगुणित अन्तिम (3) का गुणन 24
शेष पद 4 से पूर्वोक्त किया वर्ग 16
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प्राचीन गणित की यह विधि (a+b)²=a²+2ab+b² की सर्वसमिका पर
आधारित है। पूर्वोक्त उदाहरण में वस्तुतः 900+240+16 यही संक्रिया की गई है।
वर्ग का अर्थ- I. 'सदृशद्विराशिघातः'- समान दो संख्याओं का आपस में
गुणित करना ही वर्ग है¹।
II. रूपादिद्विचियपदसमासो वा-रूप अर्थात् 1 से प्रारम्भ करके उसमें
क्रमशः 2 से युक्त चय या समूह को जोड़ते हुए प्राप्त क्रमिक संख्याओं का जोड़
ही (उस पद संख्या का) वर्ग है।
III. इष्टोनयुतवधो वा---जिस संख्या का वर्ग करना है, उसमें से किसी
इष्ट संख्या को घटावें तथा उसमें उसी को जोड़ें। पुनः प्राप्त संख्याओं को आपस
में गुणित करें तथा गुणनफल में उस पूर्वोक्त इष्ट संख्या के वर्ग को जोड़े। यही
उस पूर्वोक्त संख्या का वर्ग होता है²।
१. वर्ग का यह अर्थ तथा इसकी पूर्वोक्त रीति लीलावती से शब्दशः तुलनीय है-
समद्विघातः कृतिरुच्यतेऽथ स्थाप्योऽन्त्यवर्गो द्विगुणान्त्यनिघ्नाः।
स्वस्वोपरिष्टाच्च तथापरेऽङ्कास्त्यक्त्वाऽन्त्यमुत्सार्य पुनश्च राशिम्।।
लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 8
तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.63 ग.सा.सं. 2.29.31 ग.कौ.पृ. 6 ग.ति.पृ. 7।
२. तुल. इष्टोनयुग्राशिवधः कृतिः स्यादिष्टस्य वर्गेण समन्वितो वा - लीलावती, अभित्रपरिकर्माष्टकम्
श्लोक 9, पृ. 22