त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 23
इस विधि से हमने पूर्वोक्त सूत्र पुनः प्राप्त कर लिया है। इससे (a+b)³ इस
द्विपद के घन के लिये भी समकक्ष सूत्र प्राप्त किया जा सकता है। पर वहाँ b का
अर्थ केवल 1 होगा। अतः a = कोई संख्या, b = 1 मानकर समकक्ष सूत्र इस प्रकार
है-
(a+b)³ = a³+3a (a+b) + b
[नोट ⇒ b = 1]
आगे चलकर भास्कराचार्य ने इस सूत्र के आधार पर b = किसी भी संख्या
मानते हुए (a+b)³ के लिये सूत्र विकसित किया¹, जिसके अनुरूप आधुनिक गणित
में (a+b)³ = a³+3ab (a+b) + b³ सूत्र पर्याप्त प्रसिद्ध है।
उदाहरणम्
एकस्य नवानां पञ्चदशानां को घनो भवति।
षट्पञ्चद्विकराशेस्त्रिखद्विराशेश्च कथयाशु²।। ६।।
न्यासः।। 1। 9। 15। 203। 256। जाता यथाक्रमं घनाः।। 1। 729। 3375।
8365427। 16777216। इति घनः।
सुक्षेमा अनुवाद-1, 9, 15 का तथा 203, 256 का घन क्या होता है, शीघ्र
बताओ।
अनुशीलन-प्राप्त सूत्र के अनुसार 9 संख्या का घन इस प्रकार प्राप्त होगा-
सूत्र उदाहरण
a³ = (a-1)³ + 3a (a-1) + 1 9³ = (9-1)³ + (3×9×8) + 1
⇒ 512+216+1 = 729
द्विपद के घन के सूत्र के अनुसार- (b=1)
(a+b)³ = a³ +3a (a+b) + b (8+1)³ = 8³+(3×8×9) + 1
⇒ 512+216+1 = 729
इससे यह भी स्पष्ट है कि 9³ = (7³) + (3×8×7) + 1+217 अर्थात्
343+169+217 = 729 अथवा 9³ = (6³) + (3×7×6) +1+217+169 = अर्थात्
216+127+217+169=729 इस प्रकार श्रेणी अनुक्रम से समीकरण प्राप्त होते हैं।
१. खण्डाभ्यां वा हतो राशिस्त्रिघ्नः खण्डघनैक्ययुक्। - लीलावती श्लोक 13
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 5