त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें24 त्रिशतिका
अन्य उदाहरणों का प्रथम सूत्र के अनुसार घन इस प्रकार है-
घन प्रस्तुत सूत्र के अनुसार संक्रिया प्राप्त परिणाम
15³ =(10+5)³=10³+3×10²×5+3×10×5²+5³
⇒1000+1500+750+125 =3375
203³ = (200+3)³=200³+3×200²×3+3×200×3²+3³
⇒8000000+360000+5400+27 =8365427
256³=(250+6)³=250³+3×250²×6+3×250×6²+6³
⇒15625000+1125000+27000+216=16777216
प्राचीन गणित में इस विधि को लिखने का प्रकार भिन्न था। उदाहरणतः
256³ के लिये इस विधि को इस प्रकार लिखा जाता था-
256³=25³ =15625
3×25²×6 = 11250
3×25×6² = 2700
6³ = 216
16777216
इन उदाहरणों का द्वितीय सूत्र के अनुसार घन इस प्रकार है-
15³ 14³+ (3×15×14) +1
= 2744+630+1 = 3375
203³ 202³+ (3×203×202) +1
= 8242408+123018+1 = 8365427
256³ = 255³+ (3×256×255) +1
= 16581375+195840+1 = 16777216
घनमूले करणसूत्रमार्यात्रयम्
घनपदमघनपदे द्वे घनपदतोऽपास्य घनमतो मूलम्।
संयोज्य तृतीयपदस्याधस्तदनष्टवर्गेण।। १६।।
एकस्थानेन तथा शेषं त्रिगुणेन सम्भजेत् तस्मात्।
लब्धिं निवेश्य पङ्क्त्यां तद्वर्गं त्रिगुणमन्त्यहतम्।। १७।।
जह्यादुपरिगराशेः प्राग्वद्घनमादिमस्य च स्वपदात्।
भूयस्तु तृतीयपदस्याथ इत्यादि विधि मूलम्।। १८।।
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.7। पाटी-गणित सू. 29-31, ग.सा.सं. 2.53-54 म.सि. 15.9-10, सि.
शे. 13.6-7, ग.कौ.पृ. 8-9, लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 14-15