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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 208 में से

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पृष्ठ 56

28 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-समान छेद या हर बनाकर उसके आय वाले अंश से दूसरे
व्यय वाले अंश को घटाने पर भिन्न संख्याओं का व्यवकलन होता है। (यह 'पाटी
गणित' में पाठान्तर की सहायता से अर्थ है।)
उदाहरणम्
अर्धत्र्यंशषडंशान् रूपात संशोध्य कथय शेषम्।
रूपत्रयमर्धोनं द्वे त्र्यंशयुते च कथय पञ्चभ्यः।। ८।।
न्यासः १/२ १/३ १/६ १/१ शेषं०। द्वितीयोदाहरणे न्यासः २ २ । ५ लब्धं शेषम्।
१/६ इति भिन्न-व्यवकलितम्। १/२ १/३
सुक्षेमा अनुवाद-१/२ १/३ तथा १/६ के योग को रूप या 1 से घटाने पर क्या
शेष बचेगा। 3 में से आधा कम तथा 2 तथा तीसरे अंश के योग को 5 से घटाने
पर क्या बचेगा।
अनुशीलन- प्रथम उदाहरण-
१/२+१/३+१/६ = १/१ - १/१ = 0
द्वितीय उदाहरण-
2½+2⅓ = 5/2+7/3 = 29/6 , 5/1 - 29/6 = (30-29)/6 = 1/6
भिन्नप्रत्युत्पन्ने सूत्रम्
प्रत्युत्पन्नफलं स्यादंशवधे छेदघातसंभक्ते१।
सुक्षेमा अनुवाद-छेद या हर का आपस में गुणा करके गुणनफल से अंश
के गुणनफल को विभाजित करने पर भिन्न का गुणन होता है।
उदाहरणम्
रूपत्रयमर्धफलं गुणितं, पादान्वितेन रूपेण।
अर्धं च पादगुणितं किं भवति धनं पृथक् कथय।। ९।।
न्यासः 3 1 ½ ¼ लब्धं यथाक्रमम् 35/8 ⅛ इति भिन्नप्रत्युत्पन्नः।
½ ¼
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.3 पाटी-गणित सू. 33, ग.सा.सं.3.2, म.सि. 15.15. ग.ति.पृ. 19,
लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 4