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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 208 में से

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पृष्ठ 48

20 त्रिशतिका
आगे तृतीय उपभेद के अनुसार इनका वर्ग प्रस्तुत करते हैं-
संख्या तृतीय उपभेद के सूत्र के अनुसार संक्रिया प्राप्त परिणाम
25² (25+5) (25-5) + 5² = 30×20+25 = 625
36² (36+4) (36-4) + 4² = 40×32+16 = 1296
63² (63+7) (63-7) + 7² = 70×56+49 = 3969
432² (432+32) (432-32) + 32² = 464×400+1024 = 186624
7802² (7802+802) (7802-802) + 802² = 8604×7000+643204
= 60871204
वर्गमूले करणसूत्रमार्याद्वयम्
विषमात् पदतस्त्यक्त्वा वर्गं स्थानच्युतेन मूलेन।
द्विगुणेन भजेच्छेषं लब्धं विनिवेशयेत् पंक्त्याम्॥ १२॥
तद्वर्गं संशोध्य द्विगुणीकुर्वीत पूर्वलब्धं यत्।
उत्सार्य ततो विभजेच्छेषं द्विगुणीकृतं दलयेत्१॥ १३॥
उदाहरणम्
प्राग्लब्धवर्गाणां न्यासः।। 1। 4। 9। 16। 25। 36। 49। 64। 81। 625। 1296। 3969।
186624। 60871204।। लब्धमेतेषां मूलम् 1। 2। 3। 4। 5। 6। 7। 8। 9। 25। 36। 63।
432। 7802। इति वर्गमूलम्॥
सुक्षेमा अनुवाद-अन्तिम विषम स्थान वाले अंक (सबसे बाई ओर का)
में से (महत्तम सम्भव) वर्ग संख्या को घटाकर उस वर्ग की वर्गमूल संख्या को
दूना करके सम अंक में भाग दें। पुनः लब्धि को द्विगुणीकृत वर्गमूल वाली पंक्ति
में स्थापित करें। पुनः उस लब्धि के वर्ग को अगली संख्या से संशोधित करें या
घटावें। इस प्रकार जब तक संख्या समाप्त न हो तब तक भाग आदि की क्रिया
करने से वर्गमूल प्राप्त होता है।
इससे पूर्व जिन संख्याओं का वर्ग किया गया है, उन्हीं संख्याओं का वर्गमूल
इस विधि के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। पुनरपि 186624 का वर्गमूल इस विधि
से प्रस्तुत करते हैं-
१. तुल. पाटी-गणित सू. 25-26। ग.सा.सं. 2.36, ग.कौ.पृ. 9, म.सि. 15.6 लीलावती
अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 10