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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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22 त्रिशतिका
अनुशीलन-संख्याओं के घन की यह विधि मूलतः ब्रह्मगुप्त ने विनिर्दिष्ट
की है¹।
घन की यह प्रथम प्राचीन विधि स्पष्टतः द्विपद के घन की इस सर्वसमिका
पर अवलम्बित है-
(a+b)³=a³+3a²b+3ab²+b³
घन की परिभाषा-घनोऽसौ समत्रिराशिहतिः- घन का अर्थ 3 समान
संख्याओं का आपस में गुणन करना है। इसमें वह (बाईं ओर) निर्दिष्ट संख्या
‘निर्युक्तराशि’ है।² इसे ‘अन्त्य’ नाम दिया गया है। इसके अनुसार घन का सूत्र इस
प्रकार है-
a³ = axaxa
घन का अन्य प्रकार-खैकादिचयेना--- घन की विधि यह है कि अन्त्य
या निर्दिष्ट राशि (a) में ‘खैकादिचय’ अर्थात् 0+1+2 = 3 से अथवा ‘त्र्यादि’
अर्थात् 3 तथा आदि अर्थात् निर्दिष्ट राशि वाले अंक से पहले वाले याने उपान्तिम
अंक (a-1) से गुणा करे, उसमें 1 जोड़े। पुनः उसमें ‘स्वाद्यंकघन’ (यह