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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 208 में से

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पृष्ठ 43

त्रिशतिका 15
यह ध्यान देने योग्य है कि तृतीय तथा चतुर्थ नियम के अनुसार गुणन की
दो स्थितियों की परिकल्पना की गई है तथा दोनों का परिणाम 0 बताया गया है।
आधुनिक गणित में दोनों मान्य हैं तथा इन्हें सिद्ध भी किया जा सकता है-
0×a = 0 सही है, क्योंकि 0/a = 0
इसके सही सिद्ध होने पर गुणन में क्रम-विनिमेय गुण लागू होने के कारण
a×0 = 0 भी सही सिद्ध होता है।
इस प्रकार शून्य को किसी राशि से भाग करने पर उसका फल भी शून्य
होता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि शून्य से किसी राशि को भाग देने से
उसके भागफल के विषय में सावधानीपूर्वक कुछ नहीं कहा है। इस प्रकार उन्होंने
a/0 के अपरिभाष्य होने का संकेत दिया है। आधुनिक गणित में इसे अपरिभाष्य
मानते हुए इस संक्रिया का प्रतिषेध किया जाता है¹। क्योंकि यह एक गलत
परिणाम की ओर अग्रसर करती है। उदाहरणतः, यदि 5/0 = 0 हो तो उसका अर्थ
यह होना चाहिए कि 0×0 = 5, जो कि सर्वथा गलत है। सभी प्राचीन या अद्यतन
विद्वान् 0×0 या 0² = 0 ही मानते हैं। इस प्रकार त्रिशतिकाकार के मत से भी यह
संक्रिया अपरिभाष्य है।
उदाहरणानि
षण्णवतिद्विकमेकं चैकद्विगुणानि षण्णवाष्टौ च।
सप्तत्रिगुणान् पञ्चषट्खाष्टौ च कुरु षष्टिगुणान्॥ ३॥
न्यासः । गुण्यः 1296। गुणकः 21। गुण्यः 896। गुणकः 37। गुण्यः
8065। गुणकः 60। लब्धं यथाक्रमम् 27216। 33152। 483900।।
सुक्षेमा अनुवाद-1296 को 21 से, 896 को 37 से 8065 को 60 से
गुणित करो।
इनका गुणनफल उक्त व्याख्या में ही अंकित कर दिया गया है।
अन्यदुदाहरणम्
एकादिनवान्तानि त्रिपञ्चसप्ताहतानि कथय।
त्र्यादिषडन्तानि तथा द्विशून्यसप्ताष्टगुणितानि॥ ४॥
न्यासः।। गुण्यः 987654321। गुणकः 753। गुण्यः 6543। गुणकः
8702। लब्धं यथाक्रमम् 743703703713। 56937186। एवं प्रत्युत्पन्नः समाप्तः।
१. Division by zero is prohibited, for this operation is undefined. - Scientific
Encyclopedia, U.S.A. on the word 'zero'