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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 208 में से

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पृष्ठ 47

त्रिशतिका 19
इस आधार पर प्रस्तुत तृतीय उपभेद के लिये यह सूत्र अनायास प्राप्त होता
है-
a² = (a+b) (a-b) + b²
उदाहरणम्
एकादिनवान्तानां पञ्चकृतेस्त्रिषष्टेश्च।
द्वित्रिचतुर्णां च कृतिं वद द्विशून्याष्टसप्तानाम्¹।। ५।।
न्यासः।। 1 । 2 । 3 । 4 । 5 । 6 । 7 । 8 । 9 । 25 । 36 । 63 । 432 । 7802। लब्धा यथाक्रमं
वर्गराशयः 1 । 4 । 9 । 16 । 25 । 36 । 49 । 64 । 81 । 625 । 1296 । 3969 । 186624 ।
60871204। इति वर्गः।।
सुक्षेमा अनुवाद-1 से लेकर 9 तक तथा 5 की कृति या वर्ग अर्थात् 25,
63, 432 तथा 7802 के वर्ग बताओ।
अनुशीलन-1 से 9 तक वर्ग स्पष्ट हैं। अतः 25 से आगे प्रथम उपभेद के
अनुसार वर्ग प्रस्तुत करते हैं-
वर्ग के प्रथम सूत्र के अनुसार 432 के वर्ग को प्राचीन लेखन पद्धति के
अनुसार प्रस्तुत करते हैं-
43² = 1849
2×43×2 = 172
2² = 4
—————————
186624
यह विधि द्विपद के वर्ग की सर्वसमिका पर अवलम्बित है। अथवा इसे
त्रिपद बनाकर प्राचीन विधि को अन्वित करते हैं-
432² = 4² = 16
2×4×3 = 24
3² = 9
2×43×2 = 172
2² = 4
—————————
186624
यह विधि (a+b+c)²=a²+2ab+b²+2ac+2bc+c² इस सर्वसमिका पर
आधारित है। आगे चल कर भास्कराचार्य आदि ने इसका स्पष्ट वर्णन किया है।


१. तुल. पाटी-गणित उदा. 4