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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 208 में से

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पृष्ठ 46

18 त्रिशतिका
11वें श्लोक के प्रथम उपभेद में वर्ग की सुन्दर परिभाषा दी गई है।
द्वितीय उपभेद से वर्ग का यह महत्त्वपूर्ण नियम प्राप्त होता है- ‘1
से लेकर क्रमिक धनात्मक विषम संख्याओं का जोड़ उन पदों की गिनती
का वर्ग होता है’। जैसे-
1+3+5+7+9 = 5² क्योंकि यहाँ 5 पद हैं। अतः इनका जोड़ 5 का वर्ग है।
इस नियम से हमें यह सूत्र प्राप्त होता है-
1 से क्रमिक विषम संख्याओं का योग = पदों की संख्या² या n²
अथवा ⎛ अन्तिम विषम संख्या +1 ⎞²
⎜ --------------------- ⎟
⎝ 2 ⎠
इसकी उपपत्ति के लिये संक्षेप शब्द-
सबसे पहली संख्या आदिधन (a)
संख्याओं का सामान्य अन्तर, चय, Common difference=d
1 आदि क्रमिक संख्याओं के सर्वधन का सामान्य सूत्र ⇒ n{2a+(n-1)d}

2
1+3+5+7+9-- में 2 के अन्तर से क्रमिक संख्याओं के योग की स्थिति में
a = 1, d = 2 अतः इस स्थिति में-
1+3+5----+n = n {2 + (n-1) × 2} 5 {2+ (5-1) ×2}


2 2
⇒ n (2+2n-2) ⇒ 5 (2+10-2)


2 2
⇒ n × 2n ⇒ n² ⇒ 5×10 = 50 = 25 = 5²


2 2 2
तृतीय उपभेद की उपपत्ति प्राचीन गणित में प्रचलित एक प्रसिद्ध नियम
‘वर्गान्तरं तु योगान्तरघातसमो भवति’ से प्राप्त होती है। इसका अर्थ यह है किन्हीं
दो संख्याओं के वर्ग का अन्तर ⇒ उन संख्याओं के योग उन्हीं संख्याओं के घटाव
के पश्चात् उन दोनों प्राप्त संख्याओं के गुणनफल के समतुल्य होता है। इससे हमें
गणितशास्त्र में प्रसिद्ध यह सर्वसमिका प्राप्त होती है-
a² -b² = (a+b) (a-b)