तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
तरुणके स्वप्न
[ देशबन्धुके जीवन चरित्र लेखक श्री हेमेन्द्रनाथदास-
गुप्तको लिखा हुआ पत्र । ]
मान्डला जेल
२०-१-२६
सर्वसाधारणके पढ़ने लायक देशबन्धु चितरंजनदासके
सम्बन्धमें कुछ लिखनेका साहस अभी भी मेरे अन्दर नहीं
है । कभी होगा या नहीं, मालूम नहीं। व्यक्तिगत रूपसे
मेरे साथ उनका सम्बन्ध इतना घनिष्ट था कि अन्तरंगके
सिवा उनके सम्बन्धमें और किसीसे कुछ कहनेकी इच्छा
नहीं होती । वे इतने बड़े थे और मैं इतना क्षुद्र हूं कि
मुझे भय होता है कि उनकी प्रतिभा कितनी सर्वतोमुखी,
हृदय कितना उदार, चरित्र कितना महान था, उसे आज
भी हृदयंगम नहीं कर सका हूं। ऐसी हालतमें क्षुत्र हृदय,
क्षीण विचार शक्ति और दीन भाषाकी सहायतासे उन
प्रातःस्मरणीयके सम्बन्धमें कुछ लिखना धृष्टता होगी।
तब भी इच्छा और सामग्री न रहने पर भी मित्रके अनु-
रोधसे अनेक काम करने पड़ते हैं। इसीलिये प्रिय मित्र
हेमेन्द्रनाथके अनुरोधसे यह प्रयास कर रहा हूं। देशबन्धु-
के सम्बन्धमें मैं प्रत्यक्ष रूपसे जितना जानता हूं और
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देशबन्धु
गम्भीर विवेचनके बाद उनके जीवन और कर्ममय जीवन-
का गूढ़ अर्थ जहांतक समझ सका हूं, वह लिखने पर
एक पुस्तक तैयार हो जायगी। इतनी बातें लिखनेकी
शक्ति और मनकी अनुकूल अवस्था इस समय नहीं है।
इसलिये मित्रके अनुरोधकी रक्षाकेलिये मैं कुछ बातें ही
लिखूंगा।
देशबन्धुके वैचित्र्यपूर्ण जीवनकी सब बातोंसे मैं परि-
चित नहीं हूं। जीवन चरित्रमें जो बातें अबतक छपी हैं,
वे भी सम्भवतः मुझे मालूम नहीं। मैं सिर्फ तीन वर्षतक
उनके पास था। इस समयमें भी कोशिश करनेपर बहुत
कुछ सीख सकता था किन्तु आंखें रहते हुए क्या हम
उनका मूल्य समझते हैं ? खासकर देशबन्धुके सम्बन्धमें
मेरी धारणा थी कि वे और भी कुछ साल रहेंगे और
अपने व्रतका उद्यापन न होने तक कर्मभूमिसे अवसर
ग्रहण न करेंगे। मुझे जहांतक ख्याल है उन्होंने बहुत बार
कहा था कि उनके भाग्यमें दो सालतक समुद्र पार जेलमें
रहना लिखा है। जेलके बाद वे फिर ससम्मान लौटेंगे,
अधिकारियोंके साथ समझौता होगा और वे राजसम्मान
पायेंगे, इसके बाद उनकी मृत्यु होगी। उस समय मैंने
कहा था कि आपके साथ समुद्र पार चलनेकेलिये मैं भी
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तैयार हूं। यहां आनेपर बराबर मेरे मनमें शंका होती
कि कहीं उनकी बात ठीक न निकले, वे भी कहीं यहां न
भेज दिये जायं ? किन्तु हाय इससे भी बढ़कर भयंकर
वज्रपात हुआ। हा ! भारतका भाग्य !
देशबन्धुके साथ मेरी आखिरी मुलाकात अलीपुर
जेलमें हुई थी। आरोग्य लाभ और विश्रामकेलिये वे
शिमला गये थे, मेरी गिरफ्तारीकी बात सुनकर वे फौरन
शिमलासे कलकत्ते आये थे, मुझे देखनेकेलिये वे अलीपुर
मे दो बार आये थे, बहरमपुरको बदली होनेके पहले उनसे
अन्तिम साक्षात् हुआ था। आवश्यक बाते होनेपर मैंने
उनकी चरणधूलि लेकर कहा, शायद आपके साथ बहुत
दिनोंतक मुलाकात न हो। उन्होंने अपने स्वाभाविक
उत्साह और प्रफुल्लताके साथ कहा, “नहीं ! मैं तुम्हें शीघ्र
ही छुड़वा लूंगा।” हाय ! किसे मालूम था कि अब इस
जीवनमें उनके दर्शन नहीं होंगे। उस मुलाकातका प्रत्येक
दृश्य, प्रत्येक बात, चित्रकी तरह मेरे मानस पटलपर
अंकित है, आशा है जीवन भर अंकित रहेगी। उनकी वह
शेष स्मृति ही मेरे जीवनका सम्बल है।
जनतापर देशबन्धुके अद्भुत प्रभावका क्या कारण है ?
बहुतोंने इस प्रश्नका उत्तर देनेका प्रयत्न किया है। मैं
देशबन्धु
अनुचरकी हैसियतसे उसके कारणका निर्देश करना
चाहता हूं। मैंने देखा कि वे मनुष्यके गुण दोषोंकी तरफ
दृष्टि न देकर उसे प्यार कर सकते थे। वे हृदयके सहज
भावसे ही मनुष्य मात्रको स्नेह करते थे, उनका यह
स्वाभाविक स्नेह किसी व्यक्तिके गुणावगुणकी अपेक्षा
नहीं करता था। जिनको हम घृणासे दूर कर देते हैं,
उन्हें वे हृदयसे लगा सकते थे। न जाने कितने तरहके
आदमी उनके पास आते थे और न जाने किन किन क्षेत्रों-
में उनका अपार प्रभाव था। उन्होंने चारों तरफसे जन-
समाजको आकर्षित किया था और उनका पक्ष समर्थन
कर उन्हें विजयी बनाया था। जो उनके अगाध पाण्डित्य-
के सामने नतमस्तक नहीं होते थे, असाधारण वाग्मितासे
वशीभूत नहीं होते थे, अद्भुत भाग्यसे चकित न होते थे,
वे भी उनके महान् हृदय द्वारा आकृष्ट होते थे। तथा
उनके जो साथी थे, वे मानों उनके परिवारके ही आदमी
थे। वे उनके उपकार और मङ्गलकेलिये सब कुछ करते
थे। जीवन दिये बिना जीवन नहीं मिल सकता यह बिल-
कुल सत्य है। उनके सहकर्मी उनके इशारेपर क्या नहीं
कर सकते थे। किसी भी तरहका त्याग, कष्ट, परिश्रम
उन्हें विचलित न कर पाता। उनके इशारेपर सहकर्मी
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तरुणके स्वप्न
सर्वस्व बलिदान करनेकेलिये तैयार रहते थे । देशबन्धु
जानते थे कि अहिंसा संग्राममें अनेक ऐसे अनुचर हैं
जिनका हर अवस्थामें विश्वास किया जा सकता है। मैं
गर्वके साथ कहता हूं कि अन्तिम समय तक उनके अनु-
यायियोंने उनके कहनेके अनुसार हर तरहकी विपत्तियां
और कष्ट सहर्ष सहे ।
दुःखका विषय है कि देशबन्धुके सुसंयत, कर्तव्य-
परायण निर्भीक अनुचरोंको देखकर अनेक तथाकथित
नेता इर्ष्या करते, शायद वे मन ही मन ऐसे सहकर्मी पाने-
केलिये लालायित होते । किन्तु ऐसे कर्मियोंका मूल्य
चुकानेकेलिये वे प्रस्तुत नहीं थे, कमसे कम मेरा तो
यही विचार है । सहकर्मी या अनुचरसे हार्दिक स्नेह
किये बिना बदलेमें उसका हृदय नहीं पाया जा सकता ।
अन्य लोगोंकी तरह उनके अन्दर अपने और पराये-
का भेदभाव नहीं था । उनका मकान सबके लिये खुला
था, यहां तक कि उनके शयन कक्षमें कोई भी जा सकता
था। वे अपने अनुचर वृन्दको प्रेम ही नहीं करते थे बल्कि
उनकेलिये लांछना सहनेकेलिये भी तैयार थे। एक दिन
उनके किसी कुटुम्बीने एक सहकर्मीके किसी कार्यकी
निन्दा कर कहा कि “I hate him” उन्होंने अत्यन्त व्य-
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देशबन्धु
थित होकर कहा कि यही तो मुश्किल है कि मैं घृणा
नहीं कर सकता। यही नहीं बल्कि वे बाहरके आदमियों-
से अपने आदमियोंके लिये झगड़ा भी किया करते थे। मैंने
कई बार देखा है कि वे अपने साथियोंका जोरदार सम-
र्थन करते थे और उनकी निन्दाका जोरदार प्रतिवाद
करते थे।
जो भीतरी बात नहीं जानते वे देशबन्धुकी संगठन-
शक्ति देखकर विमोहित थे, मोहित होनेकी बात भी है।
देशबन्धुने जो कुछ कर दिखाया वह भारतकी राजनीति-
में अभूतपूर्व है। मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि उन्होंने
पर्वतके समान दृढ़ संगठन किया था, उसके मूलमें अनु-
चर और नायकके प्राणोंका संयोग था। इसके सिवा
दोष गुणकी तरफ ध्यान न देकर मनुष्यमात्रको स्नेह
करनेके भाव और असाधारण बुद्धिकौशल द्वारा वे
भिन्न-भिन्न रुचि और भिन्न-भिन्न पथके लोगोंको एक
साथ चला सकते थे। जो उनके दलमें नहीं थे या उनके
मतका समर्थन नहीं करते थे, वे भी गुपचुप उनकी सहा-
यता करते थे।
अनेक तथाकथित नेताओंने कहा है कि देशबन्धुके
अनुचर और सहकर्मी दासत्वपरायण थे। देशबन्धुके
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तरुणके स्वप्न
मंत्रणागृहमें जो उपस्थित थे, वे इस बातका समर्थन नहीं
करेंगे। आलोचना और परामर्शके समय जो निर्भीक
और स्पष्टवादी थे उनको मैं दासत्वपरायण कैसे कह
सकता हूं? यहां तक कि आलोचनाके समय नायक
और अनुचर वर्गमें तुमुल विवाद छिड़ जाता, किन्तु वे
कभी भी इस तरहके विवादसे मनमें भी नाराज नहीं
होते। अनेक तो यही कहते हैं कि जो ज्यादा तर्कवितर्क
करते, वे उन्हींकी बाते' ज्यादा सुनते। यह बात सच है
कि मतभेद होनेपर भी उनके अनुयायी उच्छृङ्खल या
असंयत नहीं होते। अथवा नेतापर नाराज हो उसकी
निन्दा कर विपक्षमें नहीं मिल जाते। देशबन्धुके संघका
प्रधान नियम था संयम और शृंखला। आपसमें मतभेद
होनेपर भी बहुमत द्वारा जो निर्णय हो जाता उसे ही
सब मानते। संघके नियमोंको मानकर चलनेकी शिक्षा
इस भारतमें नवीन नहीं है। २५ सौ वर्ष पहले भगवान
बुद्धने भी भारतको यही शिक्षा दी थी। आजतक पृथ्वी-
भरमे सब जगह बौद्ध प्रार्थनाके समय कहते हैं—
बुद्धं शरणम् गच्छामि
धर्मं शरणम् गच्छामि
संघं शरणम् गच्छामि
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देशबन्धु
सचमुच क्या धर्मप्रचार, क्या स्वदेश सेवा संघ और
संघानुवर्तिताके बिना कोई भी महान् काम दुनियामें
संभव नहीं है।
और भी एक शिकायत मैंने सुनी है कि राजनीतिके
आवर्तमें पड़कर देशबन्धु शिक्षा-दीक्षामें निम्न आदमियों-
के साथ भी मिलते जुलते थे । सन् १९२१ से जीवनके
अन्तिम समय तक वे जिन सहकर्मियोंके साहचर्यमें आये
थे, उन्हें निम्नस्तरका समझते थे या नहीं, मैं नहीं जानता ।
किन्तु उनकी बातचीतसे कभी इस तरहका भाव प्रकट
नहीं हुआ। मुमकिन है कि वे अपने मनका भाव छिपा लेते
हों । एक घटना मुझे याद है, जेलसे छूटनेपर छात्रोंने
उनके अभिनन्दनकेलिये एक आयोजन किया था, सभामें
उन्हें जो अभिनन्दन दिया गया था, उसमें उनके त्याग
और देशसेवाका उल्लेख था । युवकोंकी भक्ति और
प्रेमका अर्घ्य पाकर उनका हृदय उद्वेलित हो गया । वे
चिरनवीन और चिरयुवा थे, इसीलिये युवककी वाणी
उनके हृदयपर फौरन आघात करती थी । वे जिस समय
अभिनन्दनपत्रका उत्तर देने उठे उस समय उनके हृदयमें
भावोंका तूफान उठ रहा था । अपने त्याग और कष्ट-
की बात भूलकर वे युवकोंके कष्ट और त्यागकी बात कहने
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तरुणके स्वप्न
लगे परन्तु अधिक कह न सके, उनका गला रुँध गया।
चुपचाप खड़े रहे, आंसुओंकी धाराएं झरझर बहने लगीं।
तरुणोंका राजा रोने लगा, तरुण भी रोने लगे।
जिनकेलिये उनके मनमें इतनी समवेदना, इतना प्रेम
था, उनको निम्नस्तरका वे कैसे समझ सकते थे, इसकी
तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
निश्चयही जिन्होंने देशबन्धुका काम किया है तथा
अब भी कर रहे हैं, उनके भीतर शिक्षा, दीक्षा या आभि-
जात्यका गर्व नहीं है। आशा है विनय रूपी परम सम्प-
दासे वे कभी भी रहित नहीं होंगे।
देशबन्धुका अन्तिम पत्र मुझे पटनासे मिला था।
वह पत्र सुदूर वर्मामें बैठे हुए मेरे जैसे राजबन्दीकेलिये
अमूल्य स्मृति निधि है। इस पत्रमें यह स्पष्ट मालूम
होता है कि अपने सहचर या अनुयायीके पृथक् हो जाने-
पर उसकेलिये उनका हृदय किस प्रकार तडपा करता
था। वह तड़प कितनी तीव्र होती थी इसे वे ही समझ
सकते हैं, जो देशबन्धुके हृदयको पहचानते हैं।
सन् १६२१ और १६२२ में आठ महीने तक देशबन्धु-
के साथ जेलमें रहनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इन
आठ महिनोंमें हम दो महिने तक अगल बगलकी दो
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देशबन्धु
शेलोंमें रहा करते थे। तथा दो महिने तक अन्य कई
बन्धुओंके साथ सेन्ट्रल जेलके एक बड़े हालमें थे। इस
समय उनकी सेवाका कुछ भार मेरे ऊपर था। सरका-
रीकी कृपासे आठ महिने तक मैंने उनकी सेवा करनेका
सुयोग पाया था। यह मेरे लिये अत्यन्त गौरवकी
बात है, सन् १६२१ में गिरफ्तार होनेके पहले मैंने सिर्फ
तीन चार महिने उनके अधीन काम किया था। इसलिये
तीन चार मासके कम समयमें उनको अच्छी तरह पह-
चानना मेरे लिये सम्भव नहीं था। पर जब आठ महिने
तक सेवा करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ, तब मैं उन्हें पह-
चान सका। अंग्रेजीमें कहा जाता है कि “Famelia-
rity breeds contempt” यानी विशेष घनिष्ठता होनेसे
अश्रद्धा उत्पन्न होती है। किन्तु देशबन्धुके सम्बन्धमें
कह सकता हूं कि उनके साथ घनिष्ठता होनेपर उनके
प्रति मेरी श्रद्धा सौ गुनी बढ़ गयी। उमीद है इस बातका
सभी समर्थन करेंगे।
देशबन्धु अविरल रसिकताके अपूर्व भण्डार थे, यह
बात जेलमें अच्छी तरह समझ पाया। न जाने कितने
प्रकारके मनोरंजन द्वारा वे सबको आमोदित करते।
प्रेसीडेंसी जेलमें हमारेपर पहरे संगीन धारी गोरखा नियुक्त
१५३
तरुणके स्वप्न
था। एक दिन सबेरे उठकर उन्होंने देखा कि गोरखाके
स्थानपर डण्डाधारी उत्तर भारतीय पहरेदार मौजूद है।
उसे देखते ही वे बोले, "क्यों सुभाष ! संगीनकी जगह
यह बांस कहांसे आया ? हम क्या इतने निरीह हैं?"
हंसी दिल्लगीकेलिये उन्हें कुछ सोचना नहीं पड़ता था,
वे स्वभावसेही रसिक थे।
रसबोध होनेपर आदमी प्रतिकूल घटनाओंसे कातर
नहीं होता बल्कि हर अवस्थामें उसका मजा लूट सकता
है। जेलके सुनसान स्थानमें रहनेपर ही इसकी सत्यता
अच्छी तरह अनुभव होती है।
अंग्रेजी और बंगलाके वे प्रकाण्ड पण्डित थे। अंग्रेज
कवियोंमें वे ब्राउनिंगके भक्त थे। ब्राउनिंगकी अनेक
कविताएं उन्हें कण्ठस्थ थीं। जेलमें वे बार-बार ब्राउ-
निंगकी कुछ कविताओंका पाठ किया करते थे। वे रोज
मर्राके काममें दैनिक साहित्यके अध्ययन द्वारा अनेक
मनोरंजक बातोंका जिक्र करते, मगर जब तक वे उनकी
व्याख्या नहीं करते, हम उसका पूरा मजा नहीं उठा
सकते।
देशबन्धुने अपने एक आत्मीयकेलिये ६ रुपये सैकड़े-
पर दस हजार रुपये उधार लिये थे, किन्तु वह समयपर
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देशबन्धु
रुपया नहीं चुका सका, इसलिये कर्ज देनेवालेका एटर्नी
आवश्यक लिखा पढ़ी करने उनके पास गया था।
उनके पुत्र चिररंजनसे मालूम हुआ कि यह बात अभी
तक उनके परिवारमें किसीको भी मालूम न थी। तथा
जिसके लिये उन्होंने रुपया उधार लिया था, वह उस
समय लखपति था किन्तु देशबन्धुने उससे कुछ न कह-
कर स्वयं कागजातपर दस्तखत कर दिये। स्त्री पुत्र
आदिको न बतलाकर बहुत-सा फण्ड लेकर उन्होंने
औरोंकी सहायता की थी।
जो देशबन्धुकी निन्दा किये बिना खाना नही खाते,
मैंने उन्हे विपत्तिके समय देशबन्धुका शरणागत देखा है।
इस तरहके एक महाशय एक बार दो सौ रुपयेकेलिये
देशबन्धुके पास आये थे और देशबन्धुने उन्हें चुपचाप
रुपया दे दिया था।
आठ महिनों तक साथ रहनेके कारण उनके हृदयकी
सब बातें और अनुभूति जाननेका मुझे सुयोग मिला था
किन्तु मैंने कभी भी बातचीत, या व्यवहारमें निम्नताका
चिह्न नहीं देखा। राजनिति क्षेत्रमे उनके अनेक शत्रु थे,
यह बात वे जानते भी थे, किन्तु किसीके भी प्रति उनके
मनमे विद्वेष नहीं था। यहां तक कि जरूरत होनेपर वे
उनकी सहायता करनेमें भी कुण्ठित नहीं होते थे।
१५५
तरुणके स्वप्न
जेलमें देशबन्धु अधिकतर अध्ययनमें लगे रहते।
भारतकी राष्ट्रीयताके सम्बन्धमें पुस्तक लिखनेकेलिये
उन्होंने राजनीति और अर्थ नीतिकी अनेक पुस्तकें
मंगायी थी। सब चीजोंके एकत्र हो जानेपर उन्होंने
पुस्तक लिखना आरम्भ किया था, किन्तु समयकी कमी-
के कारण वे जेलमें पुस्तक सम्पूर्ण नहीं कर सके। जेलसे
बाहर आनेपर कर्मक्षेत्रमें रहनेके कारण वे अपने इस कार्य
की पूर्ति नहीं कर सके। जेलमें राजनीति और साहित्यके
सम्बन्धमें मैंने उनके साथ काफी आलोचना की थी।
उनका विश्वास था कि हमारी राष्ट्रीयता और शिक्षा,
दीक्षाके साथ हमारे समाज तत्व, राजनीति और दर्शनका
भी उद्भव होगा। इसीलिये वे विभिन्न वर्ग और श्रेणीमें
विवाद नहीं चाहते थे और इस विषयमें कार्ल मार्क्सके
विरोधी थे। अन्तिम समयतक उनका विश्वास था कि
भारतके सभी सम्प्रदायों और श्रेणियोंमें पैक्ट हो जायगा
और सब लोग एकमत होकर स्वराज्य आन्दोलनमें योग
देंगे। अनेक लोग उनका मजाक उड़ाकर कहते कि पैक्टसे
वास्तविक संगठन या मिलन नहीं हो सकता क्योंकि मेल
सहानुभूति पर निर्भर करता है, दरमुलाईसे मेल नहीं
होता। वे कहते कि समझौता किये बिना मनुष्य दुनिया-
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देशबन्धु
में एक दिन भी नहीं रह सकता। तथा मनुष्य या समाज
एक दिन भी नहीं टिक सकता। क्या परिवारमें, क्या
सामाजिक या राजनैतिक जीवनमे, विभिन्न रुचि और
विचारके आदमियोंमे समझौता हुए विना आदमियोंका
एक साथ रहना बिलकुल असंभव है; पृथ्वीके एक प्रांत-
से दूसरे प्रान्तका व्यवसाय वाणिज्य सिर्फ आपसी
समझौतेके बलपर ही चलता है। उनके बीचमे प्रेमकी
गन्ध भी नहीं रहती, यह कहना अत्युक्ति न होगा।
भारतके हिन्दू नेताओंमें इस्लामका इतना बड़ा हिता-
कांक्षी और कोई था, यह मैं नहीं जानता। और वही
देशबन्धु तारकेश्वर सत्याग्रहके सर्वस्व थे। वे हिन्दू धर्म-
को इतना चाहते थे कि उसके लिये प्राणदेनेको तैयार थे।
किन्तु उनके मनमें अहमन्यता नहीं थी, इसीलिये वे इस-
लामको भी चाहते थे। मैं जानना चाहता हूं कितने
हिन्दू नेता हृदयपर हाथ रखकर कह सकते हैं कि वे
मुसलमानसे घृणा नहीं करते? कितने मुस्लिम नेता
हृदयपर हाथ रखकर कह सकते हैं कि हिन्दूसे घृणा नहीं
करते। देशबन्धु धर्ममतकी दृष्टिसे वैष्णव थे, किन्तु
उनके हृदयमे सब धर्मावलम्बियोंकेलिये स्थान था।
पैक्ट द्वारा विवाद मिट जानेपर भी वे यह विश्वास नहीं
१५७
तरुणके स्वप्न
करते थे कि सिर्फ इसीसे हिन्दू-मुसलमानोंमें प्रेम उत्पन्न
हो जायगा। इसीलिये वे शिक्षा (Culture) द्वारा
हिन्दू मुसलमानोंमें मैत्री स्थपित करना चाहते थे। हिंदू
संस्कृति और मुस्लिम संस्कृतिमें कहांपर मेल है, इस
विषयपर वे जेलमें अक्सर मौलाना अकरमखांके साथ
आलोचना किया करते थे। मुझे जहांतक मालूम है
हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक मिलनके सम्बन्धमें प्रबन्ध
लिखनेके लिये मौलाना साहब राजी हो गये थे।
भारतमें स्वराज्य होगा वह सिर्फ उच्च श्रेणीके
लोगोंकी स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं बल्कि जनसाधारणके
उपकार और मंगलके लिये, इस बातका देशबन्धुने जितने
जोरोंसे प्रचार किया था, प्रथम श्रेणीके अन्य किसी नेता
ने ऐसा किया था; यह मैं नहीं जानता। स्वराज्य जन-
साधारणके लिये है,यह बात कुछ नयी नहीं है। निश्चय,ही
तीस वर्ष पहले स्वामी विवेकानन्दने अपनी “वर्तमान-
भारत” नामक पुस्तकमें इसका उल्लेख किया था, किंतु
स्वामीजीकी भविष्यवाणीकी प्रतिध्वनि उस समय राज-
नीतिके रंगमंचपर सुनायी नहीं पड़ी थी।
जेलसे छूटनेके बाद देशबन्धुने जिन बातोंका प्रचार
किया था, उन्हें उन्होंने जेलमें अच्छी तरह सोच लिया था
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देशबन्धु
समय समय पर उन सब बातोंको लेकर हमलोगोंके साथ
आलोचना हुआ करती थी। कौंसिल प्रवेशकी बात
उन्होंने जेलमें ही निश्चिन्त की थी। तथा बहुत कुछ तर्क
वितर्कके बाद हमलोगोने उसका समर्थन किया था।
कौंसिल प्रवेशके प्रस्तावको लेकर उस समय जेलमें
काफी दलादलि हुई थी। दैनिक अंग्रेजी निकालनेका
सङ्कल्प भी हम सबने जेलमे ही किया था। किन्तु दुख है
कि उनके अनेक महान् संकल्प कार्य रूपमें परिणत नहीं
हुए।
जेलकी एक घटनाका उल्लेख किये बिना मैं नहीं रह
सकता। कैदियोंके प्रति उनका प्रेम! हम जिस समय
प्रेसीडेन्सी जेलसे अलीपुर जेलमें आये—उस समय हमारे
वार्डमें माथुर नामका एक कैदी काम करता था। जेलकी
भाषामें जिसे “पुराना चोर” कहते हैं, माथुर वही था।
उसे चोर कहना अन्याय है, वह डाकू था, आठ दस बार
वह जेलखानेमें आ चुका था। तथा डाकूकी तरह ही उस-
का अन्तःकरण खूब सरल था। कुछ दिन काम करनेके
बाद वह देशबन्धुको स्नेह और भक्ति करने लगा। वह
उन्हें बाबा फहने लगा। माथुरके प्रति देशबन्धुके हृदयमें
समवेदना और स्नेह उत्पन्न हुआ। कमश वह हम सबके
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तरुणके स्वप्न
प्रति खिचने लगा। रात या दिनमें जब वह उनके पैर
दबाता तब अपने जीवनकी सब बातें कहता। छूटनेके
समय उन्होंने माथुरसे कहा था कि छूटनेपर मैं तुम्हें
अपने घरपर रखूँगा। माथुर भी इस प्रस्तावसे अपार
आनन्दित हुआ और उसने संकल्प किया कि वह खराब
काम और खराब संगति छोड़ देगा।
माथुरके छुटकारेके दिन देशबन्धुने आदमी भेजकर
उसे अपने घर बुलवा लिया। इसके बाद लगभग तीन
सालतक वह उनके पास रहा। उनके परिचारककी हैसि-
यतसे वह भारतके विभिन्न प्रांतोंमें घूमा था। दागी चोर
होनेके कारण पुलिस कुछ समयतक उसके पीछे लगी
रही, किन्तु जब देखा कि सचमुच वह देशबन्धुके आश्रय-
रहने लगा तब पुलिसने उसका पीछा छोड़ दिया। जमा-
दार प्राय उसे देखकर कहता, "बच्चा ! अब तुम आदमी
हो गये।" मेरा विश्वास था कि माथुरका फिर पतन न
होगा. किन्तु देशबन्धुके देह त्यागके बाद जब पत्र द्वारा
माथुरकी खबर जाननी चाही तो सुना कि जब देशबन्धु
दार्जिलिङ्ग थे, तभी उनके रसारोडवाले मकानसे चांदीकी
कुछ चीजें लेकर वह लापता हो गया। यह अद्भुत समा-
चार पढ़कर मुझे Les Miserables की कहानी याद
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[Page Header]
देशबन्धु
आ गयी। मेरा अभी विश्वास है कि माथुर ,उनके पास
रहता तो उनके व्यक्तित्वके प्रभावसे लोभके वशीभूत
नहीं होता। क्षणिक दुर्बलताके वशीभूत होकर उसने
चोरी की थी, किन्तु मेरा विश्वास है कि वे जीवित रह-
ते तो किस न किसी दिन वह उनके पैरोंपर गिर कर
रोता हुआ माफी मंगता। अब उसकी क्या हालत
होगी सो भगवान जाने। मनुष्य कैसे एक साथ प्रकाण्ड
वैरिस्टर, उदार स्नेही, परम वैष्णव, चतुर राजनीतिज्ञ,
दिग्विजयी वीर हो सकता है। यह प्रश्न स्वभावतः सबके
मनमें उठ सकता है। मैं ने नृ-तत्व विद्याकी सहायतासे
इस प्रश्नका समाधान किया है, पर कृत कार्य हुआ हूं कि
नहीं, नहीं जानता। आर्य, द्रविड़ और मंगोल, इन तीन
जातियोंके सम्मिश्रणसे वर्तमान बंगाली जातिकी उत्पत्ति
हुई है। प्रत्येक जातिमें कुछ गुण विशेष रूपसे विक-
सित होते हैं। इसलिये रक्तका सम्मिश्रण होनेसे गुणों-
का विशेष विकाश होता है, रक्त सम्मिश्रणके फलसे
बंगालीकी प्रतिभा सर्वतोमुखी है। आर्योंकी धर्म-प्रियता
और आदर्शवाद, द्रविणोंकी कला विद्या और भक्तिमत्ता
तथा मंगोलोंका बुद्धि-कौशल और वास्तववाद बंगाल
सागरमे मिल गया है। बंगाली एक साथ ही तीक्ष्ण
[Page Footer]
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तरुणके स्वप्न
बुद्धि और भावुक, मायावाद विद्वेषी और आदर्शवादी,
अनुकरणक्षम और सृष्टिक्षम है, इसका कारण रक्त सम्मि-
श्रण है। जिस जातिका रक्त व्यक्तिकी धमनियोंमें प्रवा-
हित होता है, उसके संस्कार व्यक्तिके चित्तमें अवस्थित
रहते हैं। बंगाली जिस प्रकार एक जातिके रूपमें परिणित
हुआ है, उसी तरह बंगालीके culture ने भी एक तरहका
वैशिष्ट्य लाभ किया है।
बंगालके साहित्य और इतिहासके साथ जिनका परि-
चय है, वे स्वीकार करेंगे कि बंगालकी सभ्यता आर्य
सभ्यता होनेपर भी उसका अपना एक वैशिष्ट्य है। स्वामी
दयानन्दने आर्य-समाज चलाकर उत्तर भारत जय किया,
पर वे बंगाल जय नहीं कर सके। और काली भक्त पर-
महंस देवको बंगाली इतनी श्रद्धा भक्ति क्यों करते हैं?
बंगालमें दाय भागका प्रचलन क्यों है? बौद्ध धर्म सब
जगहसे विताड़ित होकर अन्तमें बंगालका शरणागत क्यों
हुआ? बंगालमें नव्य न्यायकी उत्पत्ति क्यों हुई? बंगा-
लने शंकरका मायावाद ग्रहण क्यों नहीं किया? बौद्ध-
धर्मके बंगालसे विताड़ित होनेपर शंकरके मायावादके
प्रतिवाद स्वरूप अचिन्त्य भेदाभेदकी सृष्टि क्यों हुई?
इन सब प्रश्नोंपर विचार करनेसे ही समझा जा सकता
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देशबन्धु
है कि बंगालकी संस्कृतिमें तीन धाराएं दिखलाई
पड़ती हैं, (१) तन्त्र (२) वैष्णव धर्म, (३) नव्य न्याय और
और रघुनन्दनकी स्मृति। न्याय और स्मृतिमें बंगाल
आर्यावर्त्तके साथ है, वैष्णव धर्ममें बंगाली द्राविणोंके
साथ है, तन्त्रोंमें वह तिव्बतीय और पर्वतीय जातियोंके
साथ है।
न्याय शास्त्रके अनुशीलनने बंगालीको तार्किक तथा
नैयायिक बना दिया। इसी प्रकृतिने विकसित होकर देश-
बन्धुको बहुत बड़ा वैरिस्टर बना दिया। देशबन्धुने
प्राचीन न्याय शास्त्र पढ़ा था या नही मालूम नहीं, किन्तु
पाश्चात्य तर्क शास्त्रका अध्ययन उन्होंने किया था। बड़े
भारी नैयायिककी तरह वे बालकी खाल निकालनेवाला तर्क
कर सकते थे। तथा अविराम वाक्य प्रवाहके द्वारा वे
शत्रु पक्षका विध्वस्त कर सकते थे। दो तीन सौ वर्ष
पहले नदियामें जन्म ग्रहण करते तो निश्चय ही वे बड़े
भारी नैयायिक होते।
वङ्गालका वैष्णव धर्म और द्वैताद्वैतवाद देशबन्धुको
नास्तिकतासे खींचकर नीरस वेदान्तके भीतरसे प्रेम मार्ग
पर ले गया था, दार्शनिक मतके रूपमें वे अचिन्त्य भेदा-
भेदवादको सबसे शुद्ध मानते थे। वे बहुत कुछ संन्यासी-
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