तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतरुणके स्वप्न
लगे परन्तु अधिक कह न सके, उनका गला रुँध गया।
चुपचाप खड़े रहे, आंसुओंकी धाराएं झरझर बहने लगीं।
तरुणोंका राजा रोने लगा, तरुण भी रोने लगे।
जिनकेलिये उनके मनमें इतनी समवेदना, इतना प्रेम
था, उनको निम्नस्तरका वे कैसे समझ सकते थे, इसकी
तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
निश्चयही जिन्होंने देशबन्धुका काम किया है तथा
अब भी कर रहे हैं, उनके भीतर शिक्षा, दीक्षा या आभि-
जात्यका गर्व नहीं है। आशा है विनय रूपी परम सम्प-
दासे वे कभी भी रहित नहीं होंगे।
देशबन्धुका अन्तिम पत्र मुझे पटनासे मिला था।
वह पत्र सुदूर वर्मामें बैठे हुए मेरे जैसे राजबन्दीकेलिये
अमूल्य स्मृति निधि है। इस पत्रमें यह स्पष्ट मालूम
होता है कि अपने सहचर या अनुयायीके पृथक् हो जाने-
पर उसकेलिये उनका हृदय किस प्रकार तडपा करता
था। वह तड़प कितनी तीव्र होती थी इसे वे ही समझ
सकते हैं, जो देशबन्धुके हृदयको पहचानते हैं।
सन् १६२१ और १६२२ में आठ महीने तक देशबन्धु-
के साथ जेलमें रहनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इन
आठ महिनोंमें हम दो महिने तक अगल बगलकी दो
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