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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

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देशबन्धु
है कि बंगालकी संस्कृतिमें तीन धाराएं दिखलाई
पड़ती हैं, (१) तन्त्र (२) वैष्णव धर्म, (३) नव्य न्याय और
और रघुनन्दनकी स्मृति। न्याय और स्मृतिमें बंगाल
आर्यावर्त्तके साथ है, वैष्णव धर्ममें बंगाली द्राविणोंके
साथ है, तन्त्रोंमें वह तिव्बतीय और पर्वतीय जातियोंके
साथ है।
न्याय शास्त्रके अनुशीलनने बंगालीको तार्किक तथा
नैयायिक बना दिया। इसी प्रकृतिने विकसित होकर देश-
बन्धुको बहुत बड़ा वैरिस्टर बना दिया। देशबन्धुने
प्राचीन न्याय शास्त्र पढ़ा था या नही मालूम नहीं, किन्तु
पाश्चात्य तर्क शास्त्रका अध्ययन उन्होंने किया था। बड़े
भारी नैयायिककी तरह वे बालकी खाल निकालनेवाला तर्क
कर सकते थे। तथा अविराम वाक्य प्रवाहके द्वारा वे
शत्रु पक्षका विध्वस्त कर सकते थे। दो तीन सौ वर्ष
पहले नदियामें जन्म ग्रहण करते तो निश्चय ही वे बड़े
भारी नैयायिक होते।
वङ्गालका वैष्णव धर्म और द्वैताद्वैतवाद देशबन्धुको
नास्तिकतासे खींचकर नीरस वेदान्तके भीतरसे प्रेम मार्ग
पर ले गया था, दार्शनिक मतके रूपमें वे अचिन्त्य भेदा-
भेदवादको सबसे शुद्ध मानते थे। वे बहुत कुछ संन्यासी-
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