तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतरुणके स्वप्न
मंत्रणागृहमें जो उपस्थित थे, वे इस बातका समर्थन नहीं
करेंगे। आलोचना और परामर्शके समय जो निर्भीक
और स्पष्टवादी थे उनको मैं दासत्वपरायण कैसे कह
सकता हूं? यहां तक कि आलोचनाके समय नायक
और अनुचर वर्गमें तुमुल विवाद छिड़ जाता, किन्तु वे
कभी भी इस तरहके विवादसे मनमें भी नाराज नहीं
होते। अनेक तो यही कहते हैं कि जो ज्यादा तर्कवितर्क
करते, वे उन्हींकी बाते' ज्यादा सुनते। यह बात सच है
कि मतभेद होनेपर भी उनके अनुयायी उच्छृङ्खल या
असंयत नहीं होते। अथवा नेतापर नाराज हो उसकी
निन्दा कर विपक्षमें नहीं मिल जाते। देशबन्धुके संघका
प्रधान नियम था संयम और शृंखला। आपसमें मतभेद
होनेपर भी बहुमत द्वारा जो निर्णय हो जाता उसे ही
सब मानते। संघके नियमोंको मानकर चलनेकी शिक्षा
इस भारतमें नवीन नहीं है। २५ सौ वर्ष पहले भगवान
बुद्धने भी भारतको यही शिक्षा दी थी। आजतक पृथ्वी-
भरमे सब जगह बौद्ध प्रार्थनाके समय कहते हैं—
बुद्धं शरणम् गच्छामि
धर्मं शरणम् गच्छामि
संघं शरणम् गच्छामि
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