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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
  • सुन्दरकाण्ड * ८९
    मन कहने लगे कि] भगवान् कैसे शरणागतवत्सल (शरणमें आये
    हुएपर पिताकी भाँति प्रेम करनेवाले) हैं॥ ५ ॥
    [दोहा ४३]
    सरनागत कहूँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
    ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥
    [श्रीरामजी फिर बोले—] जो मनुष्य अपने अहितका अनुमान
    करके शरणमें आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं,
    पापमय हैं; उन्हें देखनेमें भी हानि है (पाप लगता है) ॥ ४३ ॥
    कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
    आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
    सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
    जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ १ ॥
    जिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं
    उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों
    ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १ ॥
    पापवंत कर सहज सुभाऊ।
    भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
    जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई।
    मोरें सनमुख आव कि सोई॥ २ ॥
    पापीका यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी
    नहीं सुहाता। यदि वह (रावणका भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदयका
    होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?॥ २ ॥
    निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
    मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥

९० * श्रीरामचरितमानस *
भेद लेन पठवा दससीसा।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥ ३॥
जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है। मुझे
कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावणने भेद लेनेको
भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं
है॥ ३॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥ ४॥
क्योंकि हे सखे! जगत्‌में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण
क्षणभरमें उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत
होकर मेरे शरण आया है तो मैं उसे प्राणोंकी तरह रखूँगा॥ ४॥
[दोहा ४४]
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥
कृपाके धाम श्रीरामजीने हँसकर कहा—दोनों ही स्थितियोंमें
उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान्सहित सुग्रीवजी 'कृपालु
श्रीरामकी जय हो' कहते हुए चले॥ ४४॥
सादर तेहि आगें करि बानर।
चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता।
नयनानंद दान के दाता॥ १॥

  • सुन्दरकाण्ड * ९१
    विभीषणजीको आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ
    चले, जहाँ करुणाकी खान श्रीरघुनाथजी थे। नेत्रोंको आनन्दका
    दान देनेवाले (अत्यन्त सुखद) दोनों भाइयोंको विभीषणजीने
    दूरहीसे देखा॥ १॥
    बहुरि राम छबिधाम बिलोकी।
    रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
    भुज प्रलंब कंजारुन लोचन।
    स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥ २॥
    फिर शोभाके धाम श्रीरामजीको देखकर वे पलक [मारना]
    रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये।
    भगवान्‌की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमलके समान नेत्र हैं और
    शरणागतके भयका नाश करनेवाला साँवला शरीर है॥ २॥
    सिंघ कंध आयत उर सोहा।
    आनन अमित मदन मन मोहा॥
    नयन नीर पुलकित अति गाता।
    मन धरि धीर कही मृदु बाता॥ ३॥
    सिंहके-से कंधे हैं, विशाल वक्षःस्थल (चौड़ी छाती)
    अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवोंके मनको मोहित
    करनेवाला मुख है। भगवान्‌के स्वरूपको देखकर विभीषणजीके
    नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त
    पुलकित हो गया। फिर मनमें धीरज धरकर उन्होंने कोमल
    वचन कहे॥ ३॥
    नाथ दसानन कर मैं भ्राता।
    निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥

९२ * श्रीरामचरितमानस *
सहज पापप्रिय तामस देहा।
जथा उलूकहि तम पर नेहा॥४॥
हे नाथ! मैं दशमुख रावणका भाई हूँ। हे देवताओंके रक्षक!
मेरा जन्म राक्षसकुलमें हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभावसे ही
मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लूको अन्धकारपर सहज स्नेह होता है॥४॥
[दोहा ४५]
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥
मैं कानोंसे आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव
(जन्म-मरण)-के भयका नाश करनेवाले हैं। हे दुःखियोंके दुःख
दूर करनेवाले और शरणागतको सुख देनेवाले श्रीरघुवीर! मेरी
रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये॥४५॥
अस कहि करत दंडवत देखा।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥ १॥
प्रभुने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत् करते देखा तो वे अत्यन्त
हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषणजीके दीन वचन सुननेपर प्रभुके
मनको बहुत ही भाये। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे
पकड़कर उनको हृदयसे लगा लिया॥१॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी।
बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा।
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ २॥

  • सुन्दरकाण्ड * ९३
    छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित गले मिलकर उनको अपने पास
    बैठाकर श्रीरामजी भक्तोंके भयको हरनेवाले वचन बोले—हे
    लंकेश! परिवारसहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास बुरी
    जगहपर है॥ २॥
    खल मंडली बसहु दिनु राती।
    सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
    मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती।
    अति नय निपुन न भाव अनीती॥ ३॥
    दिन-रात दुष्टोंकी मण्डलीमें बसते हो। [ऐसी दशामें] हे
    सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति
    (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें
    अनीति नहीं सुहाती॥ ३॥
    बरु भल बास नरक कर ताता।
    दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
    अब पद देखि कुसल रघुराया।
    जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥ ४॥
    हे तात! नरकमें रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका
    संग [कभी] न दे। [विभीषणजीने कहा—] हे रघुनाथजी! अब
    आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक
    जानकर मुझपर दया की है॥ ४॥
    [दोहा ४६]
    तब लगि कुसल न जीव कहूँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
    जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥

९४ * श्रीरामचरितमानस *
तबतक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्नमें भी उसके
मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम (विषय-
कामना)-को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता॥४६॥
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।
लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरें चाप सायक कटि भाथा॥१॥
लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट
तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक कि धनुष-बाण और कमरमें
तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी हृदयमें नहीं बसते॥१॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी।
राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥२॥
ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको सुख
देनेवाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभीतक जीवके मनमें बसती
है, जबतक प्रभु (आप)-का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता॥२॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे।
देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला।
ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥३॥
हे श्रीरामजी! आपके चरणारविन्दके दर्शन कर अब मैं
कुशलसे हूँ, मेरे भारी भय मिट गये। हे कृपालु! आप जिसपर

  • सुन्दरकाण्ड * ९५
    अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकारके भवशूल (आध्यात्मिक,
    आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते ॥ ३ ॥
    मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ।
    सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
    जासु रूप मुनि ध्यान न आवा।
    तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥ ४ ॥
    मैं अत्यन्त नीच स्वभावका राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण
    नहीं किया। जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन
    प्रभुने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदयसे लगा लिया ॥ ४ ॥
    [दोहा ४७]
    अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
    देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥
    हे कृपा और सुखके पुञ्ज श्रीरामजी! मेरा अत्यन्त असीम
    सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजीके द्वारा सेवित युगल
    चरणकमलोंको अपने नेत्रोंसे देखा ॥ ४७ ॥
    सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ।
    जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
    जौं नर होइ चराचर द्रोही।
    आवै सभय सरन तकि मोही॥ १॥
    [श्रीरामजीने कहा—] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव
    कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती
    हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड-चेतन जगत्‌का द्रोही हो, यदि
    वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय ॥ १ ॥

९६ * श्रीरामचरितमानस *
तजि मद मोह कपट छल नाना।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥२॥
और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो
मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई,
पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—॥२॥
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं।
हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥३॥
इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी
एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध
देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है),
जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष,
शोक और भय नहीं है॥३॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें।
लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।
धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥४॥
ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें कैसे बसता है, जैसे लोभीके हृदयमें
धन बसा करता है। तुम-सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और
किसीके निहोरेसे (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता॥४॥

समुद्र-पार पुनरागमन, श्रीराम-संवाद, विभीषण शरणागति एवं समुद्र पर कोप (दोहा ३५-६०)

  • सुन्दरकाण्ड * ९७
    [दोहा ४८]
    सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
    ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥
    जो सगुण (साकार) भगवान्‌के उपासक हैं, दूसरेके हितमें
    लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंके
    चरणोंमें प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान हैं॥ ४८ ॥
    सुनु लंकेस सकल गुन तोरें।
    तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
    राम बचन सुनि बानर जूथा।
    सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥ १ ॥
    हे लङ्कापति! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे
    तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय हो। श्रीरामजीके वचन सुनकर सब
    वानरोंके समूह कहने लगे—कृपाके समूह श्रीरामजीकी जय
    हो!॥ १ ॥
    सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी।
    नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
    पद अंबुज गहि बारहिं बारा।
    हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥ २ ॥
    प्रभुकी वाणी सुनते हैं और उसे कानोंके लिये अमृत जानकर
    विभीषणजी अघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्रीरामजीके चरणकमलोंको
    पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, हृदयमें समाता नहीं है॥ २ ॥
    सुनहु देव सचराचर स्वामी।
    प्रनतपाल उर अंतरजामी॥

९८ * श्रीरामचरितमानस *
उर कछु प्रथम बासना रही।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ ३॥
[विभीषणजीने कहा—] हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी!
हे शरणागतके रक्षक! हे सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले!
सुनिये, मेरे हृदयमें पहले कुछ वासना थी, वह प्रभुके चरणोंकी
प्रीतिरूपी नदीमें बह गयी॥ ३॥
अब कृपाल निज भगति पावनी।
देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा।
मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ ४॥
अब तो हे कृपालु! शिवजीके मनको सदैव प्रिय लगनेवाली
अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो)
कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजीने तुरंत ही समुद्रका जल माँगा॥ ४॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं।
मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा।
सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ ५॥
[और कहा—] हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर
जगत्में मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता)। ऐसा
कहकर श्रीरामजीने उनको राजतिलक कर दिया। आकाशसे
पुष्पोंकी अपार वृष्टि हुई॥ ५॥
[दोहा ४९ (क)]
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥

  • सुन्दरकाण्ड * ९९
    श्रीरामजीने रावणके क्रोधरूपी अग्निमें, जो अपनी (विभीषणकी)
    श्वास (वचन) रूपी पवनसे प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए
    विभीषणको बचा लिया और उसे अखण्ड राज्य दिया॥ ४९ (क)॥
    [दोहा ४९ (ख)]
    जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
    सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥
    शिवजीने जो सम्पत्ति रावणको दसों सिरोंकी बलि देनेपर दी
    थी, वही सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बहुत सकुचते हुए
    दी॥ ४९ (ख)॥
    अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना।
    ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
    निज जन जानि ताहि अपनावा।
    प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥ १॥
    ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते
    हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु हैं। अपना सेवक जानकर
    विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया। प्रभुका स्वभाव वानरकुलके
    मनको [बहुत] भाया॥ १॥
    पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी।
    सर्बरूप सब रहित उदासी॥
    बोले बचन नीति प्रतिपालक।
    कारन मनुज दनुज कुल घालक॥ २॥
    फिर सब कुछ जाननेवाले, सबके हृदयमें बसनेवाले, सर्वरूप
    (सब रूपोंमें प्रकट), सबसे रहित, उदासीन, कारणसे (भक्तोंपर
    कृपा करनेके लिये) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसोंके कुलका नाश

१०० * श्रीरामचरितमानस *
करनेवाले श्रीरामजी नीतिकी रक्षा करनेवाले वचन बोले— ॥ २ ॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा।
केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती।
अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥ ३ ॥
हे वीर वानरराज सुग्रीव और लङ्कापति विभीषण! सुनो, इस
गहरे समुद्रको किस प्रकार पार किया जाय? अनेक जातिके
मगर, साँप और मछलियोंसे भरा हुआ यह अत्यन्त अथाह समुद्र
पार करनेमें सब प्रकारसे कठिन है॥ ३॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक।
कोटि सिंधु शोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई।
बिनय करिअ सागर सन जाई॥ ४॥
विभीषणजीने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये, यद्यपि आपका
एक बाण ही करोड़ों समुद्रोंको सोखनेवाला है (सोख सकता
है), तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा) कि
[पहले] जाकर समुद्रसे प्रार्थना की जाय॥ ४॥
[दोहा ५०]
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥
हे प्रभु! समुद्र आपके कुलमें बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचारकर
उपाय बतला देंगे। तब रीछ और वानरोंकी सारी सेना बिना ही
परिश्रमके समुद्रके पार उतर जायगी॥ ५०॥

  • सुन्दरकाण्ड * १०१
    सखा कही तुम्ह नीकि उपाई।
    करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
    मंत्र न यह लछिमन मन भावा।
    राम बचन सुनि अति दुख पावा॥ १॥
    [श्रीरामजीने कहा—] हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया।
    यही किया जाय, यदि दैव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मणजीके
    मनको अच्छी नहीं लगी। श्रीरामजीके वचन सुनकर तो उन्होंने
    बहुत ही दुःख पाया॥ १॥
    नाथ दैव कर कवन भरोसा।
    सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
    कादर मन कहुँ एक अधारा।
    दैव दैव आलसी पुकारा॥ २॥
    [लक्ष्मणजीने कहा—] हे नाथ! दैवका कौन भरोसा! मनमें
    क्रोध कीजिये (ले आइये) और समुद्रको सुखा डालिये। यह दैव
    तो कायरके मनका एक आधार (तसल्ली देनेका उपाय) है।
    आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥ २॥
    सुनत बिहसि बोले रघुबीरा।
    ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
    अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई।
    सिंधु समीप गए रघुराई॥ ३॥
    यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले—ऐसे ही करेंगे, मनमें
    धीरज रखो। ऐसा कहकर छोटे भाईको समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी
    समुद्रके समीप गये॥ ३॥

१०२ * श्रीरामचरितमानस *
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई।
बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए।
पाछें रावन दूत पठाए॥ ४ ॥
उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारेपर
कुश बिछाकर बैठ गये। इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभुके पास
आये थे, त्यों ही रावणने उनके पीछे दूत भेजे थे॥ ४ ॥
[दोहा ५१]
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥
कपटसे वानरका शरीर धारणकर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं।
वे अपने हृदयमें प्रभुके गुणोंकी और शरणागतपर उनके स्नेहकी
सराहना करने लगे॥ ५१ ॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ।
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने।
सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥ १ ॥
फिर वे प्रकटरूपमें भी अत्यन्त प्रेमके साथ श्रीरामजीके
स्वभावकी बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया!
तब वानरोंने जाना कि ये शत्रुके दूत हैं और वे उन सबको
बाँधकर सुग्रीवके पास ले आये॥ १ ॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर।
अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥

  • सुन्दरकाण्ड * १०३
    सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए।
    बाँधि कटक चहु पास फिराए॥२॥
    सुग्रीवने कहा—सब वानरो! सुनो, राक्षसोंके अङ्ग-भङ्ग
    करके भेज दो। सुग्रीवके वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतोंको
    बाँधकर उन्होंने सेनाके चारों ओर घुमाया॥२॥
    बहु प्रकार मारन कपि लागे।
    दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
    जो हमार हर नासा काना।
    तेहि कोसलाधीस कै आना॥३॥
    वानर उन्हें बहुत तरहसे मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते
    थे, फिर भी वानरोंने उन्हें नहीं छोड़ा। [तब दूतोंने पुकारकर
    कहा—] जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश
    श्रीरामजीकी सौगंध है॥३॥
    सुनि लछिमन सब निकट बोलाए।
    दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
    रावन कर दीजहु यह पाती।
    लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥४॥
    यह सुनकर लक्ष्मणजीने सबको निकट बुलाया। उन्हें बड़ी
    दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसोंको तुरंत ही छुड़ा दिया।
    [और उनसे कहा—] रावणके हाथमें यह चिट्ठी देना [और
    कहना—] हे कुलघातक! लक्ष्मणके शब्दों (सँदेसे)-को बाँचो॥४॥
    [दोहा ५२]
    कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
    सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥

१०४ * श्रीरामचरितमानस *
फिर उस मूर्खसे जबानी यह मेरा उदार (कृपासे भरा हुआ)
सन्देश कहना कि सीताजीको देकर उनसे (श्रीरामजीसे) मिलो,
नहीं तो तुम्हारा काल आ गया [समझो] ॥ ५२ ॥
तुरत नाइ लछिमन पद माथा।
चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए।
रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥ १ ॥
लक्ष्मणजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर, श्रीरामजीके गुणोंकी
कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिये। श्रीरामजीका यश
कहते हुए वे लङ्कामें आये और उन्होंने रावणके चरणोंमें सिर
नवाये॥ १॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता।
कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी।
जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥ २ ॥
दशमुख रावणने हँसकर बात पूछी—अरे शुक! अपनी
कुशल क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषणका समाचार सुना,
मृत्यु जिसके अत्यन्त निकट आ गयी है॥ २॥
करत राज लंका सठ त्यागी।
होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई।
कठिन काल प्रेरित चलि आई॥ ३ ॥

  • सुन्दरकाण्ड * १०५
    मूर्खने राज्य करते हुए लङ्काको त्याग दिया। अभागा अब
    जौका कीड़ा (घुन) बनेगा (जौके साथ जैसे घुन भी पिस जाता
    है, वैसे ही नर-वानरोंके साथ वह भी मारा जायगा); फिर भालु
    और वानरोंकी सेनाका हाल कह, जो कठिन कालकी प्रेरणासे
    यहाँ चली आयी है॥ ३॥
    जिन्ह के जीवन कर रखवारा।
    भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
    कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी।
    जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥ ४॥
    और जिनके जीवनका रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र
    बन गया है (अर्थात् उनके और राक्षसोंके बीचमें यदि समुद्र न
    होता तो अबतक राक्षस उन्हें मारकर खा गये होते)। फिर उन
    तपस्वियोंकी बात बता, जिनके हृदयमें मेरा बड़ा डर है॥ ४॥
    [दोहा ५३]
    की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥
    उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानोंसे मेरा सुयश सुनकर ही लौट
    गये? शत्रुसेनाका तेज और बल बताता क्यों नहीं? तेरा चित्त
    बहुत ही चकित (भौंचक्का-सा) हो रहा है॥ ५३॥
    नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें।
    मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
    मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा।
    जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥ १॥

१०६ * श्रीरामचरितमानस *
[दूतने कहा—] हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है,
वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिये (मेरी बातपर विश्वास
कीजिये)। जब आपका छोटा भाई श्रीरामजीसे जाकर मिला, तब
उसके पहुँचते ही श्रीरामजीने उसको राजतिलक कर दिया॥ १॥
रावन दूत हमहि सुनि काना।
कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे।
राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥ २॥
हम रावणके दूत हैं, यह कानोंसे सुनकर वानरोंने हमें
बाँधकर बहुत कष्ट दिये, यहाँतक कि वे हमारे कान-नाक काटने
लगे। श्रीरामजीकी शपथ दिलानेपर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा॥ २॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई।
बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी।
बिकटानन बिसाल भयकारी॥ ३॥
हे नाथ! आपने श्रीरामजीकी सेना पूछी; सो वह तो सौ
करोड़ मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। अनेकों रंगोंके
भालु और वानरोंकी सेना है, जो भयंकर मुखवाले, विशाल
शरीरवाले और भयानक हैं॥ ३॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा।
सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला।
अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥ ४॥
जिसने नगरको जलाया और आपके पुत्र अक्षयकुमारको

  • सुन्दरकाण्ड * १०७
    मारा, उसका बल तो सब वानरोंमें थोड़ा है। असंख्य नामोंवाले
    बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियोंका
    बल है और वे बड़े ही विशाल हैं॥४॥
    [दोहा ५४]
    द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
    दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥
    द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख,
    केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान्—ये सभी बलकी राशि
    हैं॥५४॥
    ए कपि सब सुग्रीव समाना।
    इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
    राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं।
    तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥१॥
    ये सब वानर बलमें सुग्रीवके समान हैं और इनके-जैसे
    [एक-दो नहीं] करोड़ों हैं, उन बहुत-सोंको गिन ही कौन
    सकता है? श्रीरामजीकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है। वे
    तीनों लोकोंको तृणके समान [तुच्छ] समझते हैं॥१॥
    अस मैं सुना श्रवन दसकंधर।
    पदुम अठारह जूथप बंदर॥
    नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं।
    जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥२॥
    हे दशग्रीव! मैंने कानोंसे ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो
    अकेले वानरोंके सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई
    वानर नहीं है, जो आपको रणमें न जीत सके॥२॥

१०८ * श्रीरामचरितमानस *
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा।
आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
शोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला।
पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥ ३॥
सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे हाथ मीजते हैं। पर श्रीरघुनाथजी
उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपोंसहित समुद्रको
सोख लेंगे। नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतोंसे उसे भरकर पूर (पाट)
देंगे॥ ३॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा।
ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका।
मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥ ४॥
और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे। सब वानर ऐसे
ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते
और डपटते हैं मानो लङ्काको निगल ही जाना चाहते हैं॥ ४॥
[दोहा ५५]
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥
सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिरपर प्रभु
(सर्वेश्वर) श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राममें करोड़ों कालोंको
जीत सकते हैं॥ ५५॥
राम तेज बल बुधि बिपुलाई।
सेष सहस सत सकहिं न गाई॥