सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ८९
मन कहने लगे कि] भगवान् कैसे शरणागतवत्सल (शरणमें आये
हुएपर पिताकी भाँति प्रेम करनेवाले) हैं॥ ५ ॥
[दोहा ४३]
सरनागत कहूँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥
[श्रीरामजी फिर बोले—] जो मनुष्य अपने अहितका अनुमान
करके शरणमें आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं,
पापमय हैं; उन्हें देखनेमें भी हानि है (पाप लगता है) ॥ ४३ ॥
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ १ ॥
जिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं
उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों
ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १ ॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई।
मोरें सनमुख आव कि सोई॥ २ ॥
पापीका यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी
नहीं सुहाता। यदि वह (रावणका भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदयका
होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?॥ २ ॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥