सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ * श्रीरामचरितमानस *
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई।
बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए।
पाछें रावन दूत पठाए॥ ४ ॥
उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारेपर
कुश बिछाकर बैठ गये। इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभुके पास
आये थे, त्यों ही रावणने उनके पीछे दूत भेजे थे॥ ४ ॥
[दोहा ५१]
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥
कपटसे वानरका शरीर धारणकर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं।
वे अपने हृदयमें प्रभुके गुणोंकी और शरणागतपर उनके स्नेहकी
सराहना करने लगे॥ ५१ ॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ।
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने।
सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥ १ ॥
फिर वे प्रकटरूपमें भी अत्यन्त प्रेमके साथ श्रीरामजीके
स्वभावकी बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया!
तब वानरोंने जाना कि ये शत्रुके दूत हैं और वे उन सबको
बाँधकर सुग्रीवके पास ले आये॥ १ ॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर।
अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥