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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 99
  • सुन्दरकाण्ड * ९९
    श्रीरामजीने रावणके क्रोधरूपी अग्निमें, जो अपनी (विभीषणकी)
    श्वास (वचन) रूपी पवनसे प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए
    विभीषणको बचा लिया और उसे अखण्ड राज्य दिया॥ ४९ (क)॥
    [दोहा ४९ (ख)]
    जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
    सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥
    शिवजीने जो सम्पत्ति रावणको दसों सिरोंकी बलि देनेपर दी
    थी, वही सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बहुत सकुचते हुए
    दी॥ ४९ (ख)॥
    अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना।
    ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
    निज जन जानि ताहि अपनावा।
    प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥ १॥
    ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते
    हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु हैं। अपना सेवक जानकर
    विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया। प्रभुका स्वभाव वानरकुलके
    मनको [बहुत] भाया॥ १॥
    पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी।
    सर्बरूप सब रहित उदासी॥
    बोले बचन नीति प्रतिपालक।
    कारन मनुज दनुज कुल घालक॥ २॥
    फिर सब कुछ जाननेवाले, सबके हृदयमें बसनेवाले, सर्वरूप
    (सब रूपोंमें प्रकट), सबसे रहित, उदासीन, कारणसे (भक्तोंपर
    कृपा करनेके लिये) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसोंके कुलका नाश