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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

९८ * श्रीरामचरितमानस *
उर कछु प्रथम बासना रही।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ ३॥
[विभीषणजीने कहा—] हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी!
हे शरणागतके रक्षक! हे सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले!
सुनिये, मेरे हृदयमें पहले कुछ वासना थी, वह प्रभुके चरणोंकी
प्रीतिरूपी नदीमें बह गयी॥ ३॥
अब कृपाल निज भगति पावनी।
देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा।
मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ ४॥
अब तो हे कृपालु! शिवजीके मनको सदैव प्रिय लगनेवाली
अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो)
कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजीने तुरंत ही समुद्रका जल माँगा॥ ४॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं।
मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा।
सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ ५॥
[और कहा—] हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर
जगत्में मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता)। ऐसा
कहकर श्रीरामजीने उनको राजतिलक कर दिया। आकाशसे
पुष्पोंकी अपार वृष्टि हुई॥ ५॥
[दोहा ४९ (क)]
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥