सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
पृष्ठ 91, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 91
- सुन्दरकाण्ड * ९१
विभीषणजीको आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ
चले, जहाँ करुणाकी खान श्रीरघुनाथजी थे। नेत्रोंको आनन्दका
दान देनेवाले (अत्यन्त सुखद) दोनों भाइयोंको विभीषणजीने
दूरहीसे देखा॥ १॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी।
रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन।
स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥ २॥
फिर शोभाके धाम श्रीरामजीको देखकर वे पलक [मारना]
रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये।
भगवान्की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमलके समान नेत्र हैं और
शरणागतके भयका नाश करनेवाला साँवला शरीर है॥ २॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा।
आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता।
मन धरि धीर कही मृदु बाता॥ ३॥
सिंहके-से कंधे हैं, विशाल वक्षःस्थल (चौड़ी छाती)
अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवोंके मनको मोहित
करनेवाला मुख है। भगवान्के स्वरूपको देखकर विभीषणजीके
नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त
पुलकित हो गया। फिर मनमें धीरज धरकर उन्होंने कोमल
वचन कहे॥ ३॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता।
निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥