सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

१०० * श्रीरामचरितमानस *
करनेवाले श्रीरामजी नीतिकी रक्षा करनेवाले वचन बोले— ॥ २ ॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा।
केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती।
अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥ ३ ॥
हे वीर वानरराज सुग्रीव और लङ्कापति विभीषण! सुनो, इस
गहरे समुद्रको किस प्रकार पार किया जाय? अनेक जातिके
मगर, साँप और मछलियोंसे भरा हुआ यह अत्यन्त अथाह समुद्र
पार करनेमें सब प्रकारसे कठिन है॥ ३॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक।
कोटि सिंधु शोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई।
बिनय करिअ सागर सन जाई॥ ४॥
विभीषणजीने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये, यद्यपि आपका
एक बाण ही करोड़ों समुद्रोंको सोखनेवाला है (सोख सकता
है), तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा) कि
[पहले] जाकर समुद्रसे प्रार्थना की जाय॥ ४॥
[दोहा ५०]
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥
हे प्रभु! समुद्र आपके कुलमें बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचारकर
उपाय बतला देंगे। तब रीछ और वानरोंकी सारी सेना बिना ही
परिश्रमके समुद्रके पार उतर जायगी॥ ५०॥