सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ * श्रीरामचरितमानस *
तबतक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्नमें भी उसके
मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम (विषय-
कामना)-को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता॥४६॥
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।
लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरें चाप सायक कटि भाथा॥१॥
लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट
तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक कि धनुष-बाण और कमरमें
तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी हृदयमें नहीं बसते॥१॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी।
राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥२॥
ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको सुख
देनेवाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभीतक जीवके मनमें बसती
है, जबतक प्रभु (आप)-का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता॥२॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे।
देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला।
ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥३॥
हे श्रीरामजी! आपके चरणारविन्दके दर्शन कर अब मैं
कुशलसे हूँ, मेरे भारी भय मिट गये। हे कृपालु! आप जिसपर