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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

९० * श्रीरामचरितमानस *
भेद लेन पठवा दससीसा।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥ ३॥
जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है। मुझे
कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावणने भेद लेनेको
भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं
है॥ ३॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥ ४॥
क्योंकि हे सखे! जगत्‌में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण
क्षणभरमें उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत
होकर मेरे शरण आया है तो मैं उसे प्राणोंकी तरह रखूँगा॥ ४॥
[दोहा ४४]
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥
कृपाके धाम श्रीरामजीने हँसकर कहा—दोनों ही स्थितियोंमें
उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान्सहित सुग्रीवजी 'कृपालु
श्रीरामकी जय हो' कहते हुए चले॥ ४४॥
सादर तेहि आगें करि बानर।
चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता।
नयनानंद दान के दाता॥ १॥