सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

९२ * श्रीरामचरितमानस *
सहज पापप्रिय तामस देहा।
जथा उलूकहि तम पर नेहा॥४॥
हे नाथ! मैं दशमुख रावणका भाई हूँ। हे देवताओंके रक्षक!
मेरा जन्म राक्षसकुलमें हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभावसे ही
मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लूको अन्धकारपर सहज स्नेह होता है॥४॥
[दोहा ४५]
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥
मैं कानोंसे आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव
(जन्म-मरण)-के भयका नाश करनेवाले हैं। हे दुःखियोंके दुःख
दूर करनेवाले और शरणागतको सुख देनेवाले श्रीरघुवीर! मेरी
रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये॥४५॥
अस कहि करत दंडवत देखा।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥ १॥
प्रभुने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत् करते देखा तो वे अत्यन्त
हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषणजीके दीन वचन सुननेपर प्रभुके
मनको बहुत ही भाये। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे
पकड़कर उनको हृदयसे लगा लिया॥१॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी।
बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा।
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ २॥