सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ९७
[दोहा ४८]
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥
जो सगुण (साकार) भगवान्के उपासक हैं, दूसरेके हितमें
लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंके
चरणोंमें प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान हैं॥ ४८ ॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें।
तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा।
सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥ १ ॥
हे लङ्कापति! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे
तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय हो। श्रीरामजीके वचन सुनकर सब
वानरोंके समूह कहने लगे—कृपाके समूह श्रीरामजीकी जय
हो!॥ १ ॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी।
नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा।
हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥ २ ॥
प्रभुकी वाणी सुनते हैं और उसे कानोंके लिये अमृत जानकर
विभीषणजी अघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्रीरामजीके चरणकमलोंको
पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, हृदयमें समाता नहीं है॥ २ ॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी।
प्रनतपाल उर अंतरजामी॥