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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 105
  • सुन्दरकाण्ड * १०५
    मूर्खने राज्य करते हुए लङ्काको त्याग दिया। अभागा अब
    जौका कीड़ा (घुन) बनेगा (जौके साथ जैसे घुन भी पिस जाता
    है, वैसे ही नर-वानरोंके साथ वह भी मारा जायगा); फिर भालु
    और वानरोंकी सेनाका हाल कह, जो कठिन कालकी प्रेरणासे
    यहाँ चली आयी है॥ ३॥
    जिन्ह के जीवन कर रखवारा।
    भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
    कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी।
    जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥ ४॥
    और जिनके जीवनका रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र
    बन गया है (अर्थात् उनके और राक्षसोंके बीचमें यदि समुद्र न
    होता तो अबतक राक्षस उन्हें मारकर खा गये होते)। फिर उन
    तपस्वियोंकी बात बता, जिनके हृदयमें मेरा बड़ा डर है॥ ४॥
    [दोहा ५३]
    की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥
    उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानोंसे मेरा सुयश सुनकर ही लौट
    गये? शत्रुसेनाका तेज और बल बताता क्यों नहीं? तेरा चित्त
    बहुत ही चकित (भौंचक्का-सा) हो रहा है॥ ५३॥
    नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें।
    मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
    मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा।
    जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥ १॥