सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ * श्रीरामचरितमानस *
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा।
आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
शोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला।
पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥ ३॥
सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे हाथ मीजते हैं। पर श्रीरघुनाथजी
उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपोंसहित समुद्रको
सोख लेंगे। नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतोंसे उसे भरकर पूर (पाट)
देंगे॥ ३॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा।
ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका।
मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥ ४॥
और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे। सब वानर ऐसे
ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते
और डपटते हैं मानो लङ्काको निगल ही जाना चाहते हैं॥ ४॥
[दोहा ५५]
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥
सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिरपर प्रभु
(सर्वेश्वर) श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राममें करोड़ों कालोंको
जीत सकते हैं॥ ५५॥
राम तेज बल बुधि बिपुलाई।
सेष सहस सत सकहिं न गाई॥