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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 93
  • सुन्दरकाण्ड * ९३
    छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित गले मिलकर उनको अपने पास
    बैठाकर श्रीरामजी भक्तोंके भयको हरनेवाले वचन बोले—हे
    लंकेश! परिवारसहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास बुरी
    जगहपर है॥ २॥
    खल मंडली बसहु दिनु राती।
    सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
    मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती।
    अति नय निपुन न भाव अनीती॥ ३॥
    दिन-रात दुष्टोंकी मण्डलीमें बसते हो। [ऐसी दशामें] हे
    सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति
    (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें
    अनीति नहीं सुहाती॥ ३॥
    बरु भल बास नरक कर ताता।
    दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
    अब पद देखि कुसल रघुराया।
    जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥ ४॥
    हे तात! नरकमें रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका
    संग [कभी] न दे। [विभीषणजीने कहा—] हे रघुनाथजी! अब
    आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक
    जानकर मुझपर दया की है॥ ४॥
    [दोहा ४६]
    तब लगि कुसल न जीव कहूँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
    जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥