सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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- सुन्दरकाण्ड * १०७
मारा, उसका बल तो सब वानरोंमें थोड़ा है। असंख्य नामोंवाले
बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियोंका
बल है और वे बड़े ही विशाल हैं॥४॥
[दोहा ५४]
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥
द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख,
केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान्—ये सभी बलकी राशि
हैं॥५४॥
ए कपि सब सुग्रीव समाना।
इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं।
तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥१॥
ये सब वानर बलमें सुग्रीवके समान हैं और इनके-जैसे
[एक-दो नहीं] करोड़ों हैं, उन बहुत-सोंको गिन ही कौन
सकता है? श्रीरामजीकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है। वे
तीनों लोकोंको तृणके समान [तुच्छ] समझते हैं॥१॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर।
पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं।
जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥२॥
हे दशग्रीव! मैंने कानोंसे ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो
अकेले वानरोंके सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई
वानर नहीं है, जो आपको रणमें न जीत सके॥२॥