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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 103
  • सुन्दरकाण्ड * १०३
    सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए।
    बाँधि कटक चहु पास फिराए॥२॥
    सुग्रीवने कहा—सब वानरो! सुनो, राक्षसोंके अङ्ग-भङ्ग
    करके भेज दो। सुग्रीवके वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतोंको
    बाँधकर उन्होंने सेनाके चारों ओर घुमाया॥२॥
    बहु प्रकार मारन कपि लागे।
    दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
    जो हमार हर नासा काना।
    तेहि कोसलाधीस कै आना॥३॥
    वानर उन्हें बहुत तरहसे मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते
    थे, फिर भी वानरोंने उन्हें नहीं छोड़ा। [तब दूतोंने पुकारकर
    कहा—] जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश
    श्रीरामजीकी सौगंध है॥३॥
    सुनि लछिमन सब निकट बोलाए।
    दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
    रावन कर दीजहु यह पाती।
    लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥४॥
    यह सुनकर लक्ष्मणजीने सबको निकट बुलाया। उन्हें बड़ी
    दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसोंको तुरंत ही छुड़ा दिया।
    [और उनसे कहा—] रावणके हाथमें यह चिट्ठी देना [और
    कहना—] हे कुलघातक! लक्ष्मणके शब्दों (सँदेसे)-को बाँचो॥४॥
    [दोहा ५२]
    कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
    सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥