सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ * श्रीरामचरितमानस *
तजि मद मोह कपट छल नाना।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥२॥
और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो
मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई,
पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—॥२॥
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं।
हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥३॥
इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी
एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध
देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है),
जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष,
शोक और भय नहीं है॥३॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें।
लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।
धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥४॥
ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें कैसे बसता है, जैसे लोभीके हृदयमें
धन बसा करता है। तुम-सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और
किसीके निहोरेसे (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता॥४॥