सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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- सुन्दरकाण्ड * ९५
अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकारके भवशूल (आध्यात्मिक,
आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते ॥ ३ ॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ।
सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा।
तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥ ४ ॥
मैं अत्यन्त नीच स्वभावका राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण
नहीं किया। जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन
प्रभुने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदयसे लगा लिया ॥ ४ ॥
[दोहा ४७]
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥
हे कृपा और सुखके पुञ्ज श्रीरामजी! मेरा अत्यन्त असीम
सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजीके द्वारा सेवित युगल
चरणकमलोंको अपने नेत्रोंसे देखा ॥ ४७ ॥
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ।
जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही।
आवै सभय सरन तकि मोही॥ १॥
[श्रीरामजीने कहा—] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव
कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती
हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड-चेतन जगत्का द्रोही हो, यदि
वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय ॥ १ ॥