सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * १०१
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई।
करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा।
राम बचन सुनि अति दुख पावा॥ १॥
[श्रीरामजीने कहा—] हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया।
यही किया जाय, यदि दैव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मणजीके
मनको अच्छी नहीं लगी। श्रीरामजीके वचन सुनकर तो उन्होंने
बहुत ही दुःख पाया॥ १॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा।
सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा।
दैव दैव आलसी पुकारा॥ २॥
[लक्ष्मणजीने कहा—] हे नाथ! दैवका कौन भरोसा! मनमें
क्रोध कीजिये (ले आइये) और समुद्रको सुखा डालिये। यह दैव
तो कायरके मनका एक आधार (तसल्ली देनेका उपाय) है।
आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥ २॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा।
ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई।
सिंधु समीप गए रघुराई॥ ३॥
यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले—ऐसे ही करेंगे, मनमें
धीरज रखो। ऐसा कहकर छोटे भाईको समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी
समुद्रके समीप गये॥ ३॥