सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104

१०४ * श्रीरामचरितमानस *
फिर उस मूर्खसे जबानी यह मेरा उदार (कृपासे भरा हुआ)
सन्देश कहना कि सीताजीको देकर उनसे (श्रीरामजीसे) मिलो,
नहीं तो तुम्हारा काल आ गया [समझो] ॥ ५२ ॥
तुरत नाइ लछिमन पद माथा।
चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए।
रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥ १ ॥
लक्ष्मणजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर, श्रीरामजीके गुणोंकी
कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिये। श्रीरामजीका यश
कहते हुए वे लङ्कामें आये और उन्होंने रावणके चरणोंमें सिर
नवाये॥ १॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता।
कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी।
जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥ २ ॥
दशमुख रावणने हँसकर बात पूछी—अरे शुक! अपनी
कुशल क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषणका समाचार सुना,
मृत्यु जिसके अत्यन्त निकट आ गयी है॥ २॥
करत राज लंका सठ त्यागी।
होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई।
कठिन काल प्रेरित चलि आई॥ ३ ॥