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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

६२ * श्रीरामचरितमानस *
तब मधुबन भीतर सब आए।
अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे।
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥४॥
तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मतिसे
सबने मधुर फल [या मधु और फल] खाये। जब रखवाले
बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग
छूटे॥४॥
[दोहा २८]
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥
उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे
हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर
आये हैं॥२८॥
जौं न होति सीता सुधि पाई।
मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा।
आइ गए कपि सहित समाजा॥१॥
यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्या वे मधुवनके
फल खा सकते थे? इस प्रकार राजा सुग्रीव मनमें विचार कर
ही रहे थे कि समाजसहित वानर आ गये॥१॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा।
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥

  • सुन्दरकाण्ड * ६३
    पूँछी कुसल कुसल पद देखी।
    राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ २ ॥
    सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव
    सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने
    उत्तर दिया—] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है। श्रीरामजीकी
    कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशेष सफलता हुई है) ॥ २ ॥
    नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना।
    राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
    सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ।
    कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥ ३ ॥
    हे नाथ! हनुमान्‌ने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके
    प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमान्‌जीसे फिर मिले
    और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३ ॥
    राम कपिन्ह जब आवत देखा।
    किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई।
    परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥ ४ ॥
    श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब
    उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे
    थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े॥ ४ ॥
    [दोहा २९]
    प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
    पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥

६४ * श्रीरामचरितमानस *
दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर
मिले और कुशल पूछी। [वानरोंने कहा—] हे नाथ! आपके
चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है॥ २९॥
जामवंत कह सुनु रघुराया।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥ १॥
जाम्बवान्‌ने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। हे नाथ! जिसपर
आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है।
देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं॥ १॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर।
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू॥ २॥
वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन
जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है।
प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो
गया॥ २॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥ ३॥
हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्‌ने जो करनी की, उसका हजार

अशोक वाटिका विध्वंस, मेघनाद-युद्ध, रावण-सभा एवं लंका-दहन (दोहा २०-३४)

  • सुन्दरकाण्ड * ६५
    मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्‌ने
    हनुमान्‌जीके सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजीको सुनाये ॥ ३ ॥
    सुनत कृपानिधि मन अति भाए।
    पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
    कहहु तात केहि भाँति जानकी।
    रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥ ४॥
    [वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत
    ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्‌जीको फिर हृदयसे
    लगा लिया और कहा—हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती
    और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं? ॥ ४॥
    [दोहा ३०]
    नाम पहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
    लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥
    (हनुमान्‌जीने कहा—) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला
    है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये
    रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस
    मार्गसे ? ॥ ३० ॥
    चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही।
    रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
    नाथ जुगल लोचन भरि बारी।
    बचन कहे कछु जनककुमारी॥ १॥
    चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजीने
    उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [हनुमान्‌जीने फिर कहा—]
    हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ
    वचन कहे— ॥ १ ॥

६६ * श्रीरामचरितमानस *
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना।
दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी।
केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥ २॥
छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [और कहना कि]
आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन,
कर्म और वचनसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी
(आप)-ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया? ॥२॥
अवगुन एक मोर मैं माना।
बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा।
निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥ ३॥
[हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका
वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो
नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा।
स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी।
जरैं न पाव देह बिरहागी॥ ४॥
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार
[अग्नि और पवनका संयोग होनेसे] यह शरीर क्षणमात्रमें जल
सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर
सुखी होनेके लिये) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी
आगसे भी देह जलने नहीं पाती॥ ४॥

  • सुन्दरकाण्ड * ६७
    सीता कै अति बिपति बिसाला।
    बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥ ५ ॥
    सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना
    कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा) ॥ ५ ॥
    [दोहा ३१]
    निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
    बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥
    हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्पके समान
    बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके
    बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये ॥ ३१ ॥
    सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना।
    भरि आए जल राजिव नयना ॥
    बचन कायँ मन मम गति जाही।
    सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥ १ ॥
    सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें
    जल भर आया [और वे बोले—] मन, शरीर और वचनसे जिसे
    मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्नमें भी
    विपत्ति हो सकती है? ॥ १ ॥
    कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।
    जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
    केतिक बात प्रभु जातुधान की।
    रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥ २ ॥
    हनुमान्‌जीने कहा—हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब

६८ * श्रीरामचरितमानस *
आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी
है ? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे ॥ २ ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥ ३॥
[भगवान् कहने लगे—] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा
उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है।
मैं तेरा प्रत्युपकार (बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी
तेरे सामने नहीं हो सकता॥ ३॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता।
लोचन नीर पुलक अति गाता॥ ४॥
हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब] विचार करके देख लिया कि
मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार-
बार हनुमान्जीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है
और शरीर अत्यन्त पुलकित है॥ ४॥
[दोहा ३२]
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥
प्रभुके वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न] मुख तथा
[पुलकित] अंगोंको देखकर हनुमान्जी हर्षित हो गये और प्रेममें

  • सुन्दरकाण्ड * ६९
    विकल होकर ‘हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए
    श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ ३२ ॥
    बार बार प्रभु चहइ उठावा।
    प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
    प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा।
    सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥ १ ॥
    प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए
    हनुमान्‌जीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल
    हनुमान्‌जीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी
    प्रेममग्न हो गये॥ १ ॥
    सावधान मन करि पुनि संकर।
    लागे कहन कथा अति सुंदर॥
    कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा।
    कर गहि परम निकट बैठावा॥ २ ॥
    फिर मनको सावधान करके शङ्करजी अत्यन्त सुन्दर कथा
    कहने लगे—हनुमान्‌जीको उठाकर प्रभुने हृदयसे लगाया और
    हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया॥ २ ॥
    कहु कपि रावन पालित लंका।
    केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
    प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
    बोला बचन बिगत अभिमाना॥ ३ ॥
    हे हनुमान्! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लङ्का और
    उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया ? हनुमान्‌जीने
    प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले— ॥ ३ ॥

७० * श्रीरामचरितमानस *
साखामृग कै बड़ि मनुसाई।
साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥४॥
बंदरका बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डालसे
दूसरी डालपर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघकर सोनेका
नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़
डाला, ॥४॥
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछु मोरि प्रभुताई॥५॥
यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी! आपहीका प्रताप है। हे नाथ!
इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है॥५॥
[दोहा ३३]
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥
हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन
नहीं है। आपके प्रभावसे रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल
जानेवाली वस्तु है] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है
(अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है) ॥३३॥
नाथ भगति अति सुखदायनी।
देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी।
एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥१॥
हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा

  • सुन्दरकाण्ड * ७१
    करके दीजिये। हनुमान्‌जीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे
    भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा ॥ १ ॥
    उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।
    ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
    यह संबाद जासु उर आवा।
    रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥ २ ॥
    हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन
    छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी-सेवकका
    संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी
    भक्ति पा गया ॥ २ ॥
    सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा।
    जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
    तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा।
    कहा चलैं कर करहु बनावा॥ ३ ॥
    प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे—कृपालु आनन्दकन्द
    श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजीने
    कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा—चलनेकी तैयारी करो ॥ ३ ॥
    अब बिलंबु केहि कारन कीजे।
    तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
    कौतुक देखि सुमन बहु बरषी।
    नभ तें भवन चले सुर हरषी॥ ४ ॥
    अब विलम्ब किस कारण किया जाय? वानरोंको तुरंत

७२ * श्रीरामचरितमानस *
आज्ञा दो। [भगवान्‌की] यह लीला (रावणवधकी तैयारी)
देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता
आकाशसे अपने-अपने लोकको चले॥ ४॥
[दोहा ३४]
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥
वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके
समूह आ गये। वानर-भालुओंके झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें
अतुलनीय बल है॥ ३४॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा।
गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना।
चितइ कृपा करि राजिव नैना॥ १॥
वे प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ
और वानर गरज रहे हैं। श्रीरामजीने वानरोंकी सारी सेना देखी।
तब कमलनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली॥ १॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा।
भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना।
सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥ २॥
रामकृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत
हो गये। तब श्रीरामजीने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया।
अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए॥ २॥

  • सुन्दरकाण्ड * ७३
    जासु सकल मंगलमय कीती।
    तासु पयान सगुन यह नीती॥
    प्रभु पयान जाना बैदेहीं।
    फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥ ३॥
    जिनकी कीर्ति सब मङ्गलोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय
    शकुन होना, यह नीति है (लीलाकी मर्यादा है)। प्रभुका प्रस्थान
    जानकीजीने भी जान लिया। उनके बायें अङ्ग फड़क-फड़ककर
    मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं] ॥ ३॥
    जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई।
    असगुन भयउ रावनहि सोई॥
    चला कटकु को बरनैं पारा।
    गर्जहिं बानर भालु अपारा॥ ४॥
    जानकीजीको जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावणके
    लिये अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता
    है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं॥ ४॥
    नख आयुध गिरि पादपधारी।
    चले गगन महि इच्छाचारी॥
    केहरिनाद भालु कपि करहीं।
    डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥ ५॥
    नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक)
    चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षोंको धारण किये कोई
    आकाशमार्गसे और कोई पृथ्वीपर चले जा रहे हैं। वे सिंहके
    समान गर्जना कर रहे हैं। [उनके चलने और गर्जनेसे]
    दिशाओंके हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं॥ ५॥

७४ * श्रीरामचरितमानस *
[छन्द १]
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे ॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥
दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत
चञ्चल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व,
देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब-के-सब मनमें हर्षित हुए कि
[अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर
योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबलप्रताप
कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके
गुणसमूहोंको गा रहे हैं॥ १॥
[छन्द २]
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई ॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥
उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेनाका
बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा
जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छपकी कठोर पीठको दाँतोंसे
पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात् बार-बार दाँतोंको गड़ाकर
कच्छपकी पीठपर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे
हैं मानो श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दर प्रस्थानयात्राको परम सुहावनी
जानकर उसकी अचल पवित्र कथाको सर्पराज शेषजी कच्छपकी
पीठपर लिख रहे हों॥ २॥

  • सुन्दरकाण्ड * ७५
    [दोहा ३५]
    एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
    जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥
    इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्रतटपर जा उतरे।
    अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ ३५॥
    उहाँ निसाचर रहहिं ससंका।
    जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
    निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा।
    नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥ १॥
    वहाँ (लङ्कामें) जबसे हनुमान्‌जी लङ्काको जलाकर गये, तबसे
    राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरोंमें सब विचार करते
    हैं कि अब राक्षसकुलकी रक्षा [-का कोई उपाय] नहीं है॥ १॥
    जासु दूत बल बरनि न जाई।
    तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
    दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी।
    मंदोदरी अधिक अकुलानी॥ २॥
    जिसके दूतका बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं
    नगरमें आनेपर कौन भलाई है (हमलोगोंकी बड़ी बुरी दशा
    होगी)? दूतियोंसे नगरनिवासियोंके वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत
    ही व्याकुल हो गयी॥ २॥
    रहसि जोरि कर पति पग लागी।
    बोली बचन नीति रस पागी॥
    कंत करष हरि सन परिहरहू।
    मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥ ३॥

७६ * श्रीरामचरितमानस *
वह एकान्तमें हाथ जोड़कर पति (रावण)-के चरणों लगी
और नीतिरसमें पगी हुई वाणी बोली—हे प्रियतम! श्रीहरिसे
विरोध छोड़ दीजिये। मेरे कहनेको अत्यन्त ही हितकर जानकर
हृदयमें धारण कीजिये॥ ३॥
समुझत जासु दूत कइ करनी।
स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई।
पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ ४॥
जिनके दूतकी करनीका विचार करते ही (स्मरण आते ही)
राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला
चाहते हैं, तो अपने मन्त्रीको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्रीको
भेज दीजिये॥ ४॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई।
सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें।
हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥ ५॥
सीता आपके कुलरूपी कमलोंके वनको दुःख देनेवाली
जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीताको दिये
(लौटाये) बिना शम्भु और ब्रह्माके किये भी आपका भला नहीं
हो सकता॥ ५॥
[दोहा ३६]
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥
श्रीरामजीके बाण सर्पोंके समूहके समान हैं और राक्षसोंके

  • सुन्दरकाण्ड * ७७
    समूह मेढकके समान। जबतक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल
    नहीं जाते) तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये॥ ३६॥
    श्रवन सुनी सठ ता करि बानी।
    बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
    सभय सुभाउ नारि कर साचा।
    मंगल महुँ भय मन अति काचा॥ १॥
    मूर्ख और जगतप्रसिद्ध अभिमानी रावण कानोंसे उसकी वाणी
    सुनकर खूब हँसा [और बोला—] स्त्रियोंका स्वभाव सचमुच
    ही बहुत डरपोक होता है। मङ्गलमें भी भय करती हो! तुम्हारा
    मन (हृदय) बहुत ही कच्चा (कमजोर) है॥ १॥
    जौं आवइ मर्कट कटकाई।
    जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
    कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा।
    तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥ २॥
    यदि वानरोंकी सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर
    अपना जीवननिर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डरसे काँपते
    हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसीकी बात है॥ २॥
    अस कहि बिहसि ताहि उर लाई।
    चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
    मंदोदरी हृदयँ कर चिंता।
    भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥ ३॥
    रावणने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदयसे लगा लिया और

७८ * श्रीरामचरितमानस *
ममता बढ़ाकर (अधिक स्नेह दर्शाकर) वह सभामें चला गया।
मन्दोदरी हृदयमें चिन्ता करने लगी कि पतिपर विधाता प्रतिकूल
हो गये ॥ ३ ॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई।
सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू।
ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ॥ ४ ॥
ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि
शत्रु की सारी सेना समुद्रके उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियोंसे
पूछा कि उचित सलाह कहिये [अब क्या करना चाहिये?]। तब
वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये (इसमें सलाहकी
कौन-सी बात है?) ॥ ४ ॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं।
नर बानर केहि लेखे माहीं॥ ५॥
आपने देवताओं और राक्षसोंको जीत लिया, तब तो कुछ
श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनतीमें
हैं? ॥ ५ ॥
[दोहा ३७]
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
मन्त्री, वैद्य और गुरु—ये तीन यदि [अप्रसन्नताके] भय या
[लाभकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं
(ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [क्रमशः] राज्य, शरीर और
धर्म—इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥ ३७॥

  • सुन्दरकाण्ड * ७९
    सोइ रावन कहँ बनी सहाई।
    अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
    अवसर जानि बिभीषनु आवा।
    भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥ १ ॥
    रावणके लिये भी वही सहायता (संयोग) आ बनी है। मन्त्री
    उसे सुना-सुनाकर (मुँहपर) स्तुति करते हैं। [इसी समय]
    अवसर जानकर विभीषणजी आये। उन्होंने बड़े भाईके चरणोंमें
    सिर नवाया॥ १ ॥
    पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन।
    बोला बचन पाइ अनुसासन॥
    जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता।
    मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥ २ ॥
    फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बैठ गये और आज्ञा
    पाकर ये वचन बोले—हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात (राय)
    पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपके हितकी
    बात कहता हूँ—॥ २ ॥
    जो आपन चाहै कल्याना।
    सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
    सो परनारि लिलार गोसाईं।
    तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥ ३ ॥
    जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और
    नाना प्रकारके सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्रीके ललाटको

८० * श्रीरामचरितमानस *
चौथके चन्द्रमाकी तरह त्याग दे (अर्थात् जैसे लोग चौथके चन्द्रमाको
नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्रीका मुख ही न देखे) ॥ ३ ॥
चौदह भुवन एक पति होई।
भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ।
अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥ ४॥
चौदहों भुवनोंका एक ही स्वामी हो, वह भी जीवोंसे वैर
करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणोंका
समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो
भी कोई भला नहीं कहता॥ ४॥
[दोहा ३८]
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥
हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ—ये सब नरकके रास्ते
हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत
(सत्पुरुष) भजते हैं॥ ३८॥
तात राम नहिं नर भूपाला।
भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता।
ब्यापक अजित अनादि अनंता॥ १॥
हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकोंके
स्वामी और कालके भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री,
धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय (विकाररहित),
अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं॥ १॥

  • सुन्दरकाण्ड * ८१
    गो द्विज धेनु देव हितकारी।
    कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
    जन रंजन भंजन खल ब्राता।
    बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ २॥
    उन कृपाके समुद्र भगवान्‌ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और
    देवताओंका हित करनेके लिये ही मनुष्य-शरीर धारण किया है।
    हे भाई! सुनिये, वे सेवकोंको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंके समूहका
    नाश करनेवाले और वेद तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले हैं॥ २॥
    ताहि बयरु तजि नाइअ माथा।
    प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
    देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही।
    भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ ३॥
    वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागतका
    दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर)-को
    जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले
    श्रीरामजीको भजिये॥ ३॥
    सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा।
    बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
    जासु नाम त्रय ताप नसावन।
    सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥ ४॥
    जिसे सम्पूर्ण जगत्‌से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण
    जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों
    तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूपमें
    प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये॥ ४॥