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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 77
  • सुन्दरकाण्ड * ७७
    समूह मेढकके समान। जबतक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल
    नहीं जाते) तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये॥ ३६॥
    श्रवन सुनी सठ ता करि बानी।
    बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
    सभय सुभाउ नारि कर साचा।
    मंगल महुँ भय मन अति काचा॥ १॥
    मूर्ख और जगतप्रसिद्ध अभिमानी रावण कानोंसे उसकी वाणी
    सुनकर खूब हँसा [और बोला—] स्त्रियोंका स्वभाव सचमुच
    ही बहुत डरपोक होता है। मङ्गलमें भी भय करती हो! तुम्हारा
    मन (हृदय) बहुत ही कच्चा (कमजोर) है॥ १॥
    जौं आवइ मर्कट कटकाई।
    जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
    कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा।
    तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥ २॥
    यदि वानरोंकी सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर
    अपना जीवननिर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डरसे काँपते
    हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसीकी बात है॥ २॥
    अस कहि बिहसि ताहि उर लाई।
    चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
    मंदोदरी हृदयँ कर चिंता।
    भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥ ३॥
    रावणने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदयसे लगा लिया और