सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ * श्रीरामचरितमानस *
वह एकान्तमें हाथ जोड़कर पति (रावण)-के चरणों लगी
और नीतिरसमें पगी हुई वाणी बोली—हे प्रियतम! श्रीहरिसे
विरोध छोड़ दीजिये। मेरे कहनेको अत्यन्त ही हितकर जानकर
हृदयमें धारण कीजिये॥ ३॥
समुझत जासु दूत कइ करनी।
स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई।
पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ ४॥
जिनके दूतकी करनीका विचार करते ही (स्मरण आते ही)
राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला
चाहते हैं, तो अपने मन्त्रीको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्रीको
भेज दीजिये॥ ४॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई।
सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें।
हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥ ५॥
सीता आपके कुलरूपी कमलोंके वनको दुःख देनेवाली
जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीताको दिये
(लौटाये) बिना शम्भु और ब्रह्माके किये भी आपका भला नहीं
हो सकता॥ ५॥
[दोहा ३६]
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥
श्रीरामजीके बाण सर्पोंके समूहके समान हैं और राक्षसोंके