सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ७९
सोइ रावन कहँ बनी सहाई।
अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा।
भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥ १ ॥
रावणके लिये भी वही सहायता (संयोग) आ बनी है। मन्त्री
उसे सुना-सुनाकर (मुँहपर) स्तुति करते हैं। [इसी समय]
अवसर जानकर विभीषणजी आये। उन्होंने बड़े भाईके चरणोंमें
सिर नवाया॥ १ ॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन।
बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता।
मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥ २ ॥
फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बैठ गये और आज्ञा
पाकर ये वचन बोले—हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात (राय)
पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपके हितकी
बात कहता हूँ—॥ २ ॥
जो आपन चाहै कल्याना।
सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं।
तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥ ३ ॥
जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और
नाना प्रकारके सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्रीके ललाटको