सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ७१
करके दीजिये। हनुमान्जीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे
भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा ॥ १ ॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।
ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा।
रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥ २ ॥
हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन
छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी-सेवकका
संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी
भक्ति पा गया ॥ २ ॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा।
जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा।
कहा चलैं कर करहु बनावा॥ ३ ॥
प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे—कृपालु आनन्दकन्द
श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजीने
कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा—चलनेकी तैयारी करो ॥ ३ ॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे।
तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी।
नभ तें भवन चले सुर हरषी॥ ४ ॥
अब विलम्ब किस कारण किया जाय? वानरोंको तुरंत