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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

७० * श्रीरामचरितमानस *
साखामृग कै बड़ि मनुसाई।
साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥४॥
बंदरका बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डालसे
दूसरी डालपर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघकर सोनेका
नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़
डाला, ॥४॥
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछु मोरि प्रभुताई॥५॥
यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी! आपहीका प्रताप है। हे नाथ!
इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है॥५॥
[दोहा ३३]
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥
हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन
नहीं है। आपके प्रभावसे रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल
जानेवाली वस्तु है] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है
(अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है) ॥३३॥
नाथ भगति अति सुखदायनी।
देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी।
एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥१॥
हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा