सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
पृष्ठ 81, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 81
- सुन्दरकाण्ड * ८१
गो द्विज धेनु देव हितकारी।
कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता।
बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ २॥
उन कृपाके समुद्र भगवान्ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और
देवताओंका हित करनेके लिये ही मनुष्य-शरीर धारण किया है।
हे भाई! सुनिये, वे सेवकोंको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंके समूहका
नाश करनेवाले और वेद तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले हैं॥ २॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा।
प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही।
भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ ३॥
वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागतका
दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर)-को
जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले
श्रीरामजीको भजिये॥ ३॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा।
बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन।
सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥ ४॥
जिसे सम्पूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण
जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों
तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूपमें
प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये॥ ४॥