सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० * श्रीरामचरितमानस *
चौथके चन्द्रमाकी तरह त्याग दे (अर्थात् जैसे लोग चौथके चन्द्रमाको
नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्रीका मुख ही न देखे) ॥ ३ ॥
चौदह भुवन एक पति होई।
भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ।
अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥ ४॥
चौदहों भुवनोंका एक ही स्वामी हो, वह भी जीवोंसे वैर
करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणोंका
समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो
भी कोई भला नहीं कहता॥ ४॥
[दोहा ३८]
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥
हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ—ये सब नरकके रास्ते
हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत
(सत्पुरुष) भजते हैं॥ ३८॥
तात राम नहिं नर भूपाला।
भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता।
ब्यापक अजित अनादि अनंता॥ १॥
हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकोंके
स्वामी और कालके भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री,
धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय (विकाररहित),
अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं॥ १॥