सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ७५
[दोहा ३५]
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥
इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्रतटपर जा उतरे।
अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ ३५॥
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका।
जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा।
नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥ १॥
वहाँ (लङ्कामें) जबसे हनुमान्जी लङ्काको जलाकर गये, तबसे
राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरोंमें सब विचार करते
हैं कि अब राक्षसकुलकी रक्षा [-का कोई उपाय] नहीं है॥ १॥
जासु दूत बल बरनि न जाई।
तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी।
मंदोदरी अधिक अकुलानी॥ २॥
जिसके दूतका बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं
नगरमें आनेपर कौन भलाई है (हमलोगोंकी बड़ी बुरी दशा
होगी)? दूतियोंसे नगरनिवासियोंके वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत
ही व्याकुल हो गयी॥ २॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी।
बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू।
मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥ ३॥